गाजियाबाद। ‘शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा’ यह सिर्फ केवल शब्द नहीं है, बल्कि ऐसे शब्द हैं जिन्हें पढ़कर देश को आजादी दिवाले वाले क्रांतिकारियों की शहादत याद आ जाती है और उनका बलिदान और समर्पण याद करके आंखे नाम हो जाती हैं। जिसने महज पंद्रह साल की उमर में मैजिस्ट्रेट ने पूछे गए सवालों के दिए गए जवाब से मैजिस्ट्रेट की बोलती बंद कर दी थी। जिन्होंने महज पंद्रह साल की उमर में ही अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। आजादी की लड़ाई लड़ते कई नारे को जन्म दिया जिन्हें सुन या पढ़ कर ही आज आज भी खून में उबाल आ जाता है। हम बात कर रहे हैं शहीद चंद्रशेखर आजाद की। गाजियाबाद शहर के बीच में स्थित हापुड़ मोड़ तिराहे की पर शहीद चंद्रशेखर की प्रतिमा लगी है। बुधवार को इस महान क्रांतिकारी की जयंती देशभर में मनाई गई। इसे विडंबना कहें या प्रशासन की अनदेखी, कि हापुड़ मोड़ पर लगी शहीद चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति विघंडित पड़ी है। जयंती के मौके पर भी नगर निगम द्वारा इस मूर्ति को अनदेखा कर दिया गया। खुद को क्रांतिकारी विचारधारा वाली सरकार और भाजपा के बहुमत वाला नगर निगम इन क्रांतिकारियों के बलिदान को आज सब भूले बैठे हैं ।राजनीति के बड़े बड़े मंचों से देशभक्ति के बड़े-बड़े दावे करने वाले किसी नेता या अधिकारी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। एक समय ऐसा था जब सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर लगी तस्वीरों को देख कर मन में उत्साह और जुनून भर जाता था, क्योंकि उन दीवारों पर उन महान क्रांतिकारियों की तस्वीरें लगी होती थी जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना बलिदान दिया था। उनकी जयंती याद रखना तो दूर की बात है प्रतिमा की जर्जर हालत इस बात का सबूत है कि नेता हो या राजनेता किसी को इन महान क्रांतिकारियों का बलिदान याद नहीं है। इसके विपरित किसी मंत्री या नेता, महानगर अध्यक्ष या जिला अध्यक्ष का जन्मदिन हो तो पूरे महानगर को होर्डिंग से सजा दिया जाता है। वहीं, आजादी के की लड़ाई में मुख्य भूमिका निभाने वालों की प्रतिमाएं अब चिड़िया और कबूतरों का आशियाना बनकर रह गई हैं।
चंद्रशेखर आाजद की राह पर छात्र
बता दें कि 23 जुलाई को 1906 को हुआ था और 23 जुलाई से 2 दिन पहले यानि गत 20 जुलाई को अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे छात्रों के साथ जो बर्बरता हुई वह दुनिया ने देखा। आज भी युवाओं में चंद्रशेखर के नक्शेकदम पर चलकर हजारों लाखों छात्र अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। चंद्राशेखर आजाद बनकर सड़कों पर अपनी आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहेंगे। भले ही वो लड़ाई सरकार के खिलाफ ही क्यों न हो, फिर चाहे वह संघर्ष छात्र-छात्राओं का हक के लिए हो या आम जनता के हक की लड़ाई हो। चंद्रा शेखर आजाद जैसा हौसला रखने वाले लाखों क्रांतिकारी उसका सामना करने के लिए तैयार हैं और बिना अपनी जान की परवाह किये बिना उसका पुरजोर विरोध करते रहेंगे।




