बरेली कैंट में सपा के टिकट पर बढ़ा सस्पेंस….
सपा के टिकट पर सबसे बड़ा पेच: मुस्लिम-हिंदू वोटों का संतुलन साधने वाला चेहरा कौन?
मुस्लिम या हिंदू चेहरे पर दांव? 2024 के लोकसभा चुनाव में महज 3,286 वोट का अंतर सपा के लिए बढ़ा रहा चुनौती
बरेली। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बरेली कैंट सीट पर समाजवादी पार्टी के टिकट को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हो गई हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह मुस्लिम चेहरे पर भरोसा जताएगी या किसी हिंदू उम्मीदवार को मैदान में उतारकर व्यापक सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश करेगी। हालांकि टिकट को लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है, लेकिन पिछले चुनावों के आंकड़े इस सीट पर सपा की रणनीतिक चुनौती जरूर सामने रखते हैं।
तीन चुनावों में लगातार घटा भाजपा की जीत का अंतर
कैंट विधानसभा सीट पर पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा लगातार जीत दर्ज करती रही है, लेकिन जीत का अंतर लगातार कम हुआ है।
2012 में भाजपा के राजेश अग्रवाल को 51,893 वोट मिले थे, जबकि सपा के फहीम साबिर अंसारी को 32,944 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 18,949 वोट रहा।
2017 में राजेश अग्रवाल दोबारा विजयी हुए। उन्हें 88,441 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के मुजाहिद हसन खान को 75,777 वोट मिले। इस बार जीत का अंतर घटकर 12,664 वोट रह गया।
2022 में भाजपा ने उम्मीदवार बदलकर संजीव अग्रवाल को मैदान में उतारा। उन्हें 98,931 वोट मिले, जबकि सपा की सुप्रिया ऐरन को 88,163 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर महज 10,768 वोट रह गया।
यानी 2012 से 2022 के बीच भाजपा की जीत का अंतर लगातार कम हुआ है। यही आंकड़ा सपा के रणनीतिकारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
2024 में मुकाबला और हुआ नजदीक
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान कैंट विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और सपा के बीच मुकाबला और दिलचस्प नजर आया। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कैंट विधानसभा से भाजपा को 95,940 वोट, जबकि सपा प्रत्याशी प्रवीण सिंह ऐरन को 92,654 वोट मिले। दोनों के बीच अंतर सिर्फ 3,286 वोट रहा।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विधानसभा चुनाव से अलग लोकसभा चुनाव में मतदान का पैटर्न और प्रत्याशी अलग होते हैं। फिर भी कैंट क्षेत्र में भाजपा और सपा के बीच इतनी कम बढ़त यह संकेत देती है कि मुकाबला एकतरफा मानना जल्दबाजी होगी।
सपा के सामने टिकट का असली पेच
कैंट शहरी और सामान्य विधानसभा सीट है। उपलब्ध चुनावी आकलनों में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 36.5 प्रतिशत बताई जाती है। ऐसे में मुस्लिम मतदाता निश्चित रूप से किसी भी दल की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। लेकिन केवल मुस्लिम वोटों के आधार पर चुनाव जीतना संभव नहीं होगा। उम्मीदवार को अन्य सामाजिक वर्गों में भी स्वीकार्यता और संगठनात्मक पकड़ बनानी होगी।
यहीं सपा के सामने टिकट का पेच पैदा होता है। यदि पार्टी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देती है तो उसके सामने हिंदू मतदाताओं के बीच मजबूत समर्थन जुटाने की चुनौती होगी। वहीं हिंदू चेहरे को टिकट देने की स्थिति में मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट रखने और पार्टी के साथ उनके भरोसे को कायम रखने की चुनौती सामने आ सकती है।
2027 में मुकाबला सिर्फ भाजपा बनाम सपा नहीं
राजनीतिक नजरिए से कैंट में 2027 की लड़ाई सिर्फ भाजपा बनाम सपा तक सीमित नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि कौन सा उम्मीदवार अपने परंपरागत वोट बैंक से आगे निकलकर दूसरे सामाजिक वर्गों में कितनी पैठ बना पाता है।
उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय मुद्दों पर पकड़ और विभिन्न वर्गों के बीच स्वीकार्यता चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे में सपा के लिए टिकट का फैसला केवल जातीय या धार्मिक गणित पर आधारित होने के बजाय जीतने की क्षमता और व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता के आधार पर करना ज्यादा अहम होगा।
आंकड़ों का संदेश साफ, लेकिन फैसला अभी दूर
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि 2012 में भाजपा की जीत का अंतर 18,949 वोट था, जो 2017 में घटकर 12,664 और 2022 में 10,768 वोट रह गया। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में कैंट क्षेत्र में दोनों प्रमुख दलों के बीच अंतर 3,286 वोट तक सिमट गया।
इन आंकड़ों से इतना जरूर संकेत मिलता है कि कैंट में मुकाबला पहले की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी हुआ है। हालांकि इन आंकड़ों के आधार पर 2027 के परिणाम की भविष्यवाणी करना संभव नहीं है।
सपा के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह ऐसा चेहरा उतार पाएगी जो मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ हिंदू मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को भी अपने पक्ष में ला सके? टिकट का फैसला इसी सवाल के जवाब पर काफी हद तक निर्भर करता दिखाई दे रहा है।




