“कागज़ों में हरा-भरा बरेली, ज़मीन पर सूखे सपनों का जंगल”
चार साल में डेढ़ करोड़ पौधे लगाने का दावा

लेकिन वन क्षेत्र बढ़ा सिर्फ एक फीसदी; देखभाल के अभाव में दम तोड़ते रहे पौधे
बरेली। हर साल पौधरोपण के नए रिकॉर्ड बनाए गए, फोटो खिंचीं, लक्ष्य पूरे होने के दावे हुए, लेकिन ज़मीन पर हरियाली की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। पिछले चार वर्षों में जिले में डेढ़ करोड़ से अधिक पौधे लगाए जाने का दावा किया गया, मगर वन क्षेत्र में महज एक फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। इससे साफ है कि पौधे लगाने की होड़ तो रही, लेकिन उन्हें पेड़ बनाने की जिम्मेदारी कहीं पीछे छूट गई।
मंझा ग्राम्य वन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां हजारों पौधे रोपे गए थे, लेकिन आज उनमें से लगभग आधे ही जीवित हैं। दूसरे स्थानों से लाकर लगाए गए बड़े पेड़ों में भी करीब एक तिहाई सूख चुके हैं। वन विभाग के लगाए पौधों की जीवित रहने की दर 65 से 70 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि अन्य विभागों द्वारा लगाए गए पौधों में केवल 15 से 20 प्रतिशत ही बच पाते हैं। इसकी मुख्य वजह सिंचाई, सुरक्षा और नियमित देखभाल के लिए संसाधनों की कमी मानी जा रही है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2025 में ही जिले में 42 लाख से अधिक पौधे लगाए गए थे। इसके बावजूद वन क्षेत्र में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो सकी। इसकी सबसे बड़ी वजह पौधों की सुरक्षा, सिंचाई और नियमित निगरानी का अभाव बताया जा रहा है। अधिकांश स्थानों पर पौधे रोपने के बाद उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया, जिससे बड़ी संख्या में पौधे सूख गए।
मंझा ग्राम्य वन इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। यहां रिकॉर्ड बनाने के उद्देश्य से हजारों पौधे लगाए गए थे, लेकिन वर्तमान में इनमें से केवल आधे ही जीवित हैं। वहीं दूसरी जगहों से ट्रांसलोकेट कर लाए गए पेड़ों में से भी लगभग एक तिहाई सूख चुके हैं।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि विभाग के पास पौधों की सुरक्षा और सिंचाई के संसाधन उपलब्ध होने से उनके लगाए गए करीब 65 से 70 प्रतिशत पौधे बच जाते हैं। जबकि पौधरोपण अभियान में शामिल अन्य 27 विभागों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होने के कारण उनके लगाए गए केवल 15 से 20 प्रतिशत पौधे ही जीवित रह पाते हैं।
बरेली से गायब होता बांस
एक समय “बांस बरेली” के नाम से प्रसिद्ध रहे जिले में अब बांस का रकबा लगभग समाप्त हो चुका है। वर्तमान में केवल सीबीगंज स्थित वन विभाग के आरबोरेटम और आंवला क्षेत्र में ही बांस की कुछ प्रजातियां बची हैं। कभी बांस के फर्नीचर उद्योग के लिए मशहूर बरेली में अब बड़े पैमाने पर बांस की खेती नहीं होती।
विकास कार्यों में कटे 75 हजार पेड़
पिछले तीन वर्षों में विकास परियोजनाओं के लिए जिले में 75 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई की गई। बरेली-मथुरा हाईवे, बरेली-पीलीभीत हाईवे और लाल फाटक-रामगंगा मार्ग के चौड़ीकरण के दौरान काटे गए पेड़ों के बदले पौधरोपण मिर्जापुर, नजीबाबाद और सिद्धार्थनगर में कराया गया। वन विभाग के अनुसार जिले में पर्याप्त वन भूमि उपलब्ध न होने के कारण स्थानीय स्तर पर प्रतिपूरक पौधरोपण संभव नहीं हो सका।
धोपेश्वरनाथ क्षेत्र की मुहिम भी रही विफल
कैंट स्थित धोपेश्वरनाथ मंदिर के पास वर्ष 2020 से पहले बड़े पैमाने पर पौधरोपण किया गया था। पौधों की सुरक्षा के लिए मेड़बंदी और सीमेंट के खंभे भी लगाए गए थे, लेकिन अधिकांश पौधे सूख गए। आज वहां गिने-चुने पेड़ ही बचे हैं, जबकि अधिकांश स्थान फिर से बंजर नजर आने लगे हैं।
वर्षवार पौधरोपण लक्ष्य
2022: 38.66 लाख पौधे
2023: 42.73 लाख पौधे
2024: 42.72 लाख पौधे
2025: 42 लाख पौधे
2026: 36 लाख पौधों का लक्ष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पौधे लगाने से हरियाली नहीं बढ़ेगी। जब तक पौधों की नियमित देखभाल, सिंचाई, सुरक्षा और जीवित रखने की प्रभावी व्यवस्था नहीं होगी, तब तक करोड़ों पौधों का लक्ष्य भी कागजी उपलब्धि बनकर रह जाएगा।



