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3.97 करोड़ की पानी की टंकी किच्छा नदी में समाई, निर्माण स्थल के चयन पर उठे सवाल

तेज कटान में जल जीवन मिशन की निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक ढही, अधिकारियों ने शुरू कराई जांच

बरेली। किच्छा नदी के बढ़ते जलस्तर और तेज कटान ने जल जीवन मिशन के तहत बैरमनगर गांव में करीब 3.97 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन पानी की टंकी को अपनी चपेट में ले लिया। निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया। घटना के बाद ग्रामीणों में रोष है और परियोजना के लिए स्थल चयन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
यह कार्य उत्तर प्रदेश जल निगम के अंतर्गत कराया जा रहा था, बता दें कि यह काम एक्सईएन आकांक्षा सिंह, एई संजय कुमार की देखरेख में हो रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस ओवरहेड पानी की टंकी का निर्माण कार्य एनसीसी लिमिटेड कंपनी (NCC Limited Company) द्वारा किया जा रहा था, जो जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण इलाकों में पेयजल परियोजनाओं का काम संभाल रही है।

ग्रामीणों के मुताबिक, सुबह के समय नदी की ओर लगातार भूमि कटान हो रहा था। इसी दौरान निर्माणाधीन टंकी का हिस्सा धीरे-धीरे नदी की ओर खिसकने लगा और देखते ही देखते टंकी का ढांचा नदी में जा गिरा। मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने पूरी घटना का वीडियो भी बनाया।

पहले ही दिखाई दे रहे थे कटान के संकेत

ग्रामीणों का कहना है कि जिस स्थान पर टंकी का निर्माण शुरू कराया गया था, उस समय किच्छा नदी करीब 100 से 200 मीटर की दूरी पर थी। बाद में लगातार नदी का रुख बदलने और तेज कटान के कारण नदी निर्माण स्थल के बेहद करीब पहुंच गई। ग्रामीणों ने निर्माण स्थल के चयन को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि समय रहते संभावित कटान को ध्यान में रखकर जगह का चयन किया जाता तो करोड़ों रुपये की परियोजना को नुकसान से बचाया जा सकता था।

एसडीएम ने मौके पर पहुंचकर लिया जायजा

घटना की जानकारी मिलने के बाद एसडीएम मीरगंज निधि शुक्ला मौके पर पहुंचीं और स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों ने उनके सामने निर्माण स्थल के चयन और परियोजना पर खर्च हुई धनराशि को लेकर सवाल उठाए।
ग्रामीणों का कहना है कि जिस परियोजना पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे थे, उसका इस तरह नदी में समा जाना गंभीर मामला है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग की।

डीएम ने जांच के दिए निर्देश

मामले में डीएम अविनाश सिंह ने कहा कि ओवरहेड टैंक को बचाने का भरसक प्रयास किया गया, लेकिन तेज कटान और नदी के बहाव के कारण उसे नहीं बचाया जा सका। उन्होंने बताया कि पूरे प्रकरण की जांच शुरू करा दी गई है और जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

भूमि चयन पर फिर उठे सवाल

टंकी के नदी में समाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों रुपये की परियोजना के लिए भूमि का चयन किस आधार पर किया गया था। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गांव में पर्याप्त जमीन उपलब्ध होने के बावजूद नदी के नजदीक स्थल पर निर्माण कराया गया। हालांकि जल निगम की ओर से बताया गया कि निर्माण के समय उपलब्ध परिस्थितियों और स्थल की स्थिति को देखते हुए भूमि का चयन किया गया था। बाद में नदी के बहाव और तेज कटान से स्थिति बदल गई।

जल निगम की अधिशासी अभियंता का कहना :

जल निगम की अधिशासी अभियंता आकांक्षा सिंह के अनुसार, टैंक के निर्माण के लिए भूमि का चयन उस समय की परिस्थितियों के आधार पर किया गया था। मूल रूप से आवंटित भूमि नदी के तट से करीब 200 मीटर दूर थी और उस समय यह स्थान बाढ़ क्षेत्र में नहीं आता था।
विभाग के अनुसार, टैंक निर्माण के बाद नदी के प्रवाह और तेज कटान के कारण नदी का किनारा लगातार बदलता गया। अत्यधिक कटान के चलते टैंक के आसपास की जमीन का क्षरण हुआ और उसकी नींव के पास स्थिरता प्रभावित हो गई। इसके परिणामस्वरूप ओवरहेड टैंक नदी में गिरकर क्षतिग्रस्त हो गया। विभाग ने प्रथम दृष्टया टंकी के गिरने का कारण निर्माण गुणवत्ता या निर्माण संबंधी दोष के बजाय अत्यधिक भू-कटान बताया है।

अधिकारियों ने उपकरणों को पहले ही हटाया

कटान की सूचना मिलने के बाद जल जीवन मिशन से जुड़े अधिकारियों ने परियोजना स्थल पर मौजूद कई महंगे उपकरणों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया था। इनमें जनरेटर, सौर ऊर्जा पैनल, पंप और स्काडा सिस्टम समेत अन्य सामान शामिल बताया गया है। इससे उपकरणों को नदी में बहने से बचा लिया गया।

 

ग्रामीणों में नाराजगी, बोले- सरकारी धन के नुकसान का जवाब कौन देगा?

ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के लिए करोड़ों रुपये की धनराशि खर्च होने के बाद निर्माणाधीन टंकी का नदी में समा जाना गंभीर प्रशासनिक और तकनीकी सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि जांच में सिर्फ टंकी गिरने का कारण ही नहीं, बल्कि स्थल चयन, सर्वे, तकनीकी स्वीकृति, निर्माण प्रक्रिया और अब तक खर्च हुई धनराशि की भी पड़ताल होनी चाहिए।
अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर हैं कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना के नदी में समाने के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है और सरकार को हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी।

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