लोकधुनों पर झूमी वसुंधरा की धरती, देवभूमि की संस्कृति ने बांधा समां
‘सामरिक’ के विमोचन के साथ सजी सांस्कृतिक शाम, लोकगीतों-भजनों की प्रस्तुतियों ने देर रात तक मोहा मन
गाजियाबाद। वसुंधरा की शाम उस वक्त देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक रंगत में डूब गई, जब पारंपरिक लोकधुनों, गीतों और भजनों के सुरों ने माहौल को जीवंत कर दिया। मौका था ‘सामरिक’ के विमोचन के अवसर पर आयोजित भव्य सांस्कृतिक संध्या का। मंच से उठती लोक संगीत की मधुर स्वर लहरियों ने उपस्थित लोगों को उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपरा से जोड़ा और देर रात तक कार्यक्रम स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। कार्यक्रम का शुभारंभ विधिवत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात उत्तराखंड की लोक संस्कृति पर केंद्रित रंगारंग प्रस्तुतियों का दौर शुरू हुआ। लोक कलाकारों ने पारंपरिक गीतों और संगीत के साथ भक्ति से सराबोर भजनों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों की प्रस्तुतियों में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू, लोक जीवन की सहजता और देवभूमि की आध्यात्मिक आभा साफ नजर आई।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री सुनील कुमार शर्मा, एस.जी. पब्लिक स्कूल सेक्टर-15 वसुंधरा के डायरेक्टर राजा रमन खन्ना, पार्षद नरेश भाटी, समाजसेवी विनोद पंत, पूर्व पार्षद आशा भाटी, वसुंधरा व्यापार मंडल के सेक्रेटरी विपिन त्यागी ‘कोकी’ तथा व्यापार मंडल के वाइस प्रेसिडेंट विश्वास पंत ने संयुक्त रूप से ‘सामरिक’ का विमोचन किया।
कार्यक्रम में मौजूद गणमान्य लोगों और क्षेत्रवासियों ने कलाकारों का उत्साहवर्धन करते हुए प्रस्तुतियों का आनंद लिया। लोकगीतों की मिठास और भजनों की आध्यात्मिकता ने वातावरण में ऐसा रंग घोला कि उपस्थित दर्शक देर रात तक कार्यक्रम से जुड़े रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि लोक संस्कृति किसी समाज की पहचान और उसकी जड़ों का जीवंत दस्तावेज होती है। आधुनिकता के दौर में ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लोकगीत, लोकसंगीत और पारंपरिक कलाएं केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संजोई गई हमारी सामूहिक स्मृतियों और संस्कारों की अमूल्य धरोहर हैं।
सांस्कृतिक संध्या का समापन भक्ति और लोक संगीत की स्वर लहरियों के बीच हुआ। कार्यक्रम से विदा होते लोगों के चेहरों पर संतोष और मन में लोक संस्कृति की मधुर गूंज थी। वसुंधरा की इस शाम ने यह संदेश भी दिया कि जब संस्कृति सुरों के साथ मंच पर उतरती है तो क्षेत्र ही नहीं, दिलों के बीच की दूरियां भी मिटने लगती हैं।




