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घरौनी कागजों में, अन्न भंडारण फाइलों में:

लोकसभा में उठे सवालों से ग्रामीण योजनाओं की हकीकत उजागर

बरेली। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में संपत्ति के अधिकार और किसानों के लिए वैज्ञानिक भंडारण सुविधा उपलब्ध कराने वाली दो अहम सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत सवालों के घेरे में है। लोकसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद नीरज मौर्य द्वारा पूछे गए अतारांकित प्रश्नों के जवाब में केंद्र सरकार ने जो जानकारी दी, उससे साफ हुआ कि करोड़ों ग्रामीणों को घरौनी (प्रॉपर्टी कार्ड) मिलने के बावजूद उत्तर प्रदेश में इन कार्डों के आधार पर बैंक ऋण का लाभ नहीं मिल सका है। वहीं, पैक्स के माध्यम से प्रस्तावित अनाज गोदामों में भी प्रदेश के 12 जिलों में केवल एक गोदाम का निर्माण पूरा हो पाया है।
सांसद नीरज मौर्य के साथ सांसद देवेश शाक्य और रुचि वीरा ने भी इन मुद्दों को लोकसभा में उठाया।

1.04 करोड़ घरौनी, लेकिन बैंक ऋण शून्य

स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण आबादी को उनकी संपत्ति का कानूनी रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जा रहा है। 5 अगस्त 2026 तक देशभर में 2.72 करोड़ से अधिक प्रॉपर्टी कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, जिनमें अकेले उत्तर प्रदेश में 1.04 करोड़ से अधिक कार्ड शामिल हैं।
योजना का उद्देश्य केवल संपत्ति का रिकॉर्ड देना नहीं, बल्कि उसे आर्थिक संसाधन बनाकर बैंक ऋण दिलाना भी है। हालांकि, केंद्र सरकार के जवाब के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रॉपर्टी कार्ड के आधार पर एक भी ऋण वितरण दर्ज नहीं हुआ। इसके विपरीत राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और मिजोरम जैसे राज्यों में कुल 11,147 ऋण खातों के माध्यम से लगभग 1,713.68 करोड़ रुपये का ऋण वितरित किया गया, जिसमें राजस्थान सबसे आगे रहा।

आर्थिक सशक्तिकरण का उद्देश्य अधूरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरौनी के आधार पर ग्रामीणों को बैंक ऋण नहीं मिलता, तो योजना का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। छोटे किसान, ग्रामीण गरीब और सीमित आय वाले परिवार संपत्ति के आधार पर संस्थागत ऋण लेकर स्वरोजगार, कृषि और छोटे व्यवसाय को बढ़ावा दे सकते थे।

पैक्स गोदाम योजना भी धीमी

किसानों को फसल का सुरक्षित भंडारण उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई विकेंद्रीकृत अनाज भंडारण योजना भी उत्तर प्रदेश में अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है। प्रदेश के 12 जिलों में पैक्स गोदाम प्रस्तावित किए गए थे, लेकिन अब तक केवल मिर्जापुर में ही निर्माण पूरा हो सका है। शेष 11 जिलों में कार्य लंबित है।
केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि भूमि उपलब्ध न होना और राज्य स्तर पर कार्य शुरू न होना जैसी वजहों से निर्माण प्रभावित हुआ है। परिणामस्वरूप किसानों को स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक भंडारण सुविधा का लाभ अभी तक नहीं मिल पाया है।

योजनाओं की असली परीक्षा जमीनी परिणाम

लोकसभा में उठे इन सवालों ने ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। एक ओर ग्रामीणों को संपत्ति का दस्तावेज मिला, लेकिन उससे आर्थिक लाभ नहीं मिला। दूसरी ओर किसानों की उपज के सुरक्षित भंडारण की योजना भी अधिकांश जिलों में अधूरी है।
योजनाओं की सफलता केवल कार्ड वितरण या घोषणाओं से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि क्या ग्रामीणों को वास्तव में बैंक ऋण मिला और क्या किसानों को अपनी फसल सुरक्षित रखने के लिए गोदाम उपलब्ध हुए। फिलहाल, दोनों योजनाएं उत्तर प्रदेश में अपने मूल उद्देश्य से काफी दूर दिखाई दे रही हैं।

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