रस्सी पर बचपन, नीचे खड़ी संवेदनाएं
मासूम की जान जोखिम में, पेट की आग ने बनाया मजबूर-विनोद पंत बोले, तमाशा नहीं मदद का हाथ बढ़ाएं

गाजियाबाद। एक तरफ मासूमियत से भरा बचपन, दूसरी तरफ पेट की आग और परिवार का पालन-पोषण। सड़क किनारे सामने आया एक ऐसा दृश्य हर संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक झकझोर सकता है, जहां एक मासूम बच्चा जमीन से ऊपर बंधी रस्सी पर संतुलन बनाकर लोगों के सामने खेल दिखाने को मजबूर था। चेहरे पर बचपन था, लेकिन कदमों में मजबूरी और हर पल जान का जोखिम।
इस मार्मिक दृश्य को देखकर समाजसेवी विनोद पंत भी भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि बच्चे तो आखिर बच्चे ही होते हैं, चाहे हमारे हों या किसी और के, उनके लिए इतनी खतरनाक परिस्थितियों में खेल दिखाना मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवार की मजबूरी है।
सवाल यह है कि ऐसे दृश्य देखकर भी हमारी संवेदनाएं क्यों नहीं जागतीं?
विनोद पंत ने कहा कि किसी बच्चे को रस्सी पर खतरनाक करतब करते देखकर तालियां बजाना या तमाशा देखना समस्या का समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि बिना खेल दिखाए भी इन परिवारों की मदद के लिए समाज आगे आए। यदि हम वास्तव में मानवता और सामाजिक सौहार्द की बात करते हैं तो ऐसे बच्चों की सुरक्षा और उनके परिवार के सम्मानजनक जीवन के लिए सहयोग करना होगा। उन्होंने नागरिकों से अपील करते हुए कहा कि जब भी इस तरह का कोई दृश्य सामने आए तो उसे महज मनोरंजन समझकर नजर अंदाज न करें। एक छोटी-सी मदद किसी परिवार की मजबूरी कम कर सकती है और किसी मासूम को जोखिम भरे बचपन से बचा सकती है। विनोद पंत ने कहा कि समाज की असली संवेदनशीलता तभी दिखाई देगी, जब हम जरूरतमंद को तमाशा नहीं बल्कि इंसान समझकर उसके साथ खड़े होंगे। मासूमों का बचपन रस्सी पर नहीं, सुरक्षित जमीन पर होना चाहिए।



