जहां गूंजनी चाहिए शहीदों की गाथा, वहां छा गया सियासी होर्डिग्स का साया!
गाजियाबाद। देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह आज भी करोड़ों देशवासियों के लिए साहस, त्याग और देशभक्ति की प्रेरणा हैं। लेकिन गाजियाबाद के घंटाघर स्थित शहीद स्थल पर उनकी प्रतिमा के सामने राजनीतिक होर्डिंग लगाए जाने का मामला सामने आने के बाद शहीदों के सम्मान को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। घंटाघर रामलीला मैदान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आगमन को लेकर लगाए गए होर्डिंग के कारण भगत सिंह की प्रतिमा का दृश्य प्रभावित हुआ। तस्वीरें सामने आने के बाद पूर्व महापौर आशु वर्मा ने इस पर आपत्ति जताई और शहीदों के सम्मान का मुद्दा उठाया। यह सवाल किसी एक राजनीतिक दल या नेता तक सीमित नहीं होना चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिक प्रचार के लिए शहर में कई स्थान मौजूद हैं, लेकिन जिस स्थान पर देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारी की प्रतिमा स्थापित हो वहां सबसे पहले सम्मान और मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। भगत सिंह सिर्फ एक प्रतिमा नहीं हैं। वह उस पीढ़ी की याद हैं जिसने आजादी की कीमत अपने खून से चुकाई। उनकी शहादत हमें यह याद दिलाती है कि देश सबसे ऊपर है और राष्ट्र के लिए बलिदान देने वालों का सम्मान राजनीति से कहीं बड़ा विषय है। राजनीतिक कार्यक्रम आते हैं और समाप्त हो जाते हैं। होर्डिंग लगते हैं और कुछ दिनों बाद उतर जाते हैं, लेकिन शहीदों की विरासत पीढ़ियों तक रहती है। इसलिए सवाल सीधा है कि क्या शहीद भगत सिंह की प्रतिमा के सामने कोई भी प्रचार सामग्री लगाने से पहले हमें एक पल रुककर यह नहीं सोचना चाहिए कि जिनके कारण हम आज आजाद भारत में सांस ले रहे हैं, उनके सम्मान की जगह सबसे ऊपर होनी चाहिए? ध्यान रखिए कि शहीदों की प्रतिमाएं प्रचार का स्थान नहीं बल्कि देशभक्ति और प्रेरणा के तीर्थ हैं।




