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मां ने बेटी के सपनों को दिए पंख

रिदम ने मलेशिया में जीते दो स्वर्ण पदक

बोलने और सुनने में असमर्थ रिदम ने मलेशिया में आयोजित एशियन पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप-2026 में दो स्वर्ण पदक जीतकर किया देश और शहर का नाम रोशन

बरेली। हौसले बुलंद हों तो मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। इस बात को बरेली की अंतरराष्ट्रीय एथलीट रिदम शर्मा ने अपनी उपलब्धियों से साबित कर दिखाया है। बोलने और सुनने में असमर्थ रिदम ने मलेशिया में आयोजित एशियन पैसिफिक डेफ एथलेटिक्स चैंपियनशिप-2026 में दो स्वर्ण पदक जीतकर देश और शहर का नाम रोशन किया। लगातार दूसरे वर्ष अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में दो गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। उनकी इस सफलता के पीछे कड़ी मेहनत के साथ मां पूनम शर्मा का त्याग और संघर्ष भी जुड़ा है। बेटी को आगे बढ़ाने के लिए मां ने अपनी कान की बाली तक बेच दी।
रिदम ने प्रतियोगिता में 400 मीटर दौड़ और 100 गुणा 400 मीटर रिले रेस में स्वर्ण पदक हासिल किए। उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करना गर्व की बात रही। रिदम अपनी बात इशारों के माध्यम से कहती हैं। उनकी मां पूनम शर्मा के जरिए उनके अनुभवों और संघर्ष की कहानी सामने आई है।

विदेश में मिली सुविधाओं ने किया प्रभावित

रिदम के मुताबिक, मलेशिया में खिलाड़ियों के लिए अच्छी व्यवस्थाएं की गई थीं। खिलाड़ियों को बस से मैदान तक ले जाते समय पुलिस की गाड़ियां यातायात नियंत्रित करने के लिए साथ चलती थीं, जिससे वे समय पर पहुंच जाते थे। उन्होंने कहा कि ऐसी सुविधाओं से खिलाड़ियों को काफी सहूलियत मिलती है। अपने शहर में कई बार यातायात जाम के कारण अभ्यास और प्रतियोगिताओं में देरी हो जाती है।
मलेशिया में खानपान को लेकर भी उन्हें कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ा। शुद्ध शाकाहारी भोजन आसानी से नहीं मिल पाता था, हालांकि दाल, चावल और पनीर उपलब्ध हो जाते थे। खरीदारी के दौरान भी उन्हें भारतीय मुद्रा और मलेशियाई रिंगिट के अंतर का एहसास हुआ। घर से जेब खर्च के लिए मिले 1500 रुपये में से एक दर्जन केले और चार सेब खरीदने में ही 827 रुपये खर्च हो गए। ऐसे में उन्हें खर्च को लेकर सावधानी बरतनी पड़ी।

खेल के दम पर पाना चाहती हैं सरकारी नौकरी

रिदम खेल के साथ फिल्मों में भी रुचि रखती हैं। उन्हें खासकर दक्षिण भारतीय फिल्में देखना पसंद है और दृश्यों के माध्यम से उनकी कहानी समझने की कोशिश करती हैं। वह नियमित रूप से अखबार भी पढ़ती हैं। उनका सपना खेल के दम पर सरकारी नौकरी हासिल करना है, ताकि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के साथ खेल को भी जारी रख सकें।
रिदम की सफलता के पीछे उनकी मां पूनम शर्मा का बड़ा योगदान है। बेटी को खेल में आगे बढ़ाने के लिए उन्हें कई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। बेंगलुरु में ट्रायल के लिए भेजने के दौरान खर्च जुटाने के लिए उन्होंने अपनी कान की बाली बेच दी। मलेशिया भेजने, जूते-कपड़े खरीदने और स्वास्थ्य जांच समेत पूरी प्रक्रिया में करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए।
अब आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए उन्हें फिर से लोगों से आर्थिक मदद मांगनी पड़ सकती है। रिदम और उनकी मां का कहना है कि प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को पर्याप्त आर्थिक सहायता और उचित पुरस्कार राशि मिलनी चाहिए, ताकि पैसों की कमी उनके सपनों और प्रतिभा के रास्ते में बाधा न बने। रिदम की उपलब्धि बताती है कि दृढ़ संकल्प, मेहनत और परिवार का साथ मिले तो सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मंच पर सफलता हासिल की जा सकती है।

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