कांग्रेस ने खोली चार सीटों की फाइल, सपा के सीट गणित में हलचल
मीरगंज, आंवला, कैंट और शहर पर ठोका दावा, गठबंधन में सीटों के बंटवारे का पेंच
2022 के चुनाव में चारों सीटों पर सीमित रहा था कांग्रेस का प्रदर्शन, 2027 से पहले संगठन की ताकत पर नजर
बरेली। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की सियासी बिसात बिछने लगी है। अभी चुनाव में वक्त है, लेकिन विपक्षी खेमे में सीटों को लेकर दावेदारी का खेल शुरू हो गया है। कांग्रेस ने बरेली की चार विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव प्रदेश नेतृत्व को भेजकर सियासी हलचल बढ़ा दी है। मीरगंज, आंवला, बरेली कैंट और शहर सीट पर कांग्रेस की नजर है। अब सवाल यह है कि गठबंधन की स्थिति में समाजवादी पार्टी (सपा) इन सीटों पर क्या रुख अपनाएगी और सीटों के बंटवारे का फार्मूला कैसे तय होगा?
कांग्रेस की इस पहल ने बरेली में विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन के समीकरणों को चर्चा में ला दिया है। एक तरफ कांग्रेस संगठन सृजन अभियान के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ सपा के सामने अपने चुनावी समीकरणों के साथ गठबंधन की संभावनाओं को साधने की चुनौती होगी। यदि दोनों दल साथ चुनाव लड़ते हैं तो सीटों पर सहमति अहम होगी। अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में विपक्षी मतों के बंटवारे का सवाल भी उठेगा।
चार सीटें, अलग-अलग चुनावी समीकरण
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बरेली कैंट सीट पर भाजपा के संजीव अग्रवाल को 98,931 और सपा की सुप्रिया ऐरन को 88,163 वोट मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी मोहम्मद इस्लाम अंसारी को 2,280 मत प्राप्त हुए थे। भाजपा ने यह सीट 10,768 वोटों से जीती थी।
आंवला में भाजपा के धर्मपाल सिंह को 88,956 और सपा के पंडित राधाकृष्ण शर्मा को 70,532 वोट मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी ओमवीर को 2,307 मत मिले, जबकि भाजपा की जीत का अंतर 18,424 वोट रहा था।
मीरगंज सीट पर भाजपा के डॉ. डीसी वर्मा को 1,16,435 और सपा के सुल्तान बेग को 83,955 वोट मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी मोहम्मद इलियास को 5,288 मत प्राप्त हुए थे। वहीं, बरेली शहर सीट पर भाजपा के डॉ. अरुण कुमार को 1,29,014 और सपा के राजेश अग्रवाल को 96,694 वोट मिले थे। कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णकांत शर्मा को 2,311 वोट प्राप्त हुए थे।
कांग्रेस की दावेदारी, सपा के सामने सीटों का सवाल
पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि चारों सीटों पर कांग्रेस का प्रदर्शन सीमित रहा था। हालांकि, आगामी चुनाव में प्रत्याशियों का प्रभाव, संगठन की सक्रियता और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होंगी। ऐसे में कांग्रेस की दावेदारी को केवल पिछले चुनाव के आंकड़ों से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा।




