कागजों में प्रतिबंधित पॉलिथीन, कचरे में बेखौफ—गोवंश के पेट में पहुंच रहा ‘जहर’
कान्हा गोशाला में मृत सांड़ के पेट से करीब 30 से 35 किलो पॉलिथीन निकलना व्यवस्था और नागरिक जिम्मेदारी दोनों पर गंभीर खड़े करता है सवाल

‘स्वच्छ शहर’ का नारा और गोवंश के पेट से निकलती पॉलिथीन—दोनों तस्वीरें साथ-साथ रहेंगी चलती
बरेली। पॉलिथीन पर प्रतिबंध के दावे और जमीनी हकीकत के बीच गोवंश की जान फंस गई है। बाजारों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रही पॉलिथीन जब कचरे के साथ सड़कों और खुले स्थानों पर पहुंचती है तो भोजन की तलाश में गोवंश उसे भी निगल जाते हैं। नतीजा यह कि कचरे के साथ पेट में पहुंची पॉलिथीन उनकी जान पर भारी पड़ रही है।
कान्हा गोशाला में मृत सांड़ के पेट से करीब 30 से 35 किलो पॉलिथीन निकलना व्यवस्था और नागरिक जिम्मेदारी दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पशु चिकित्सकों के मुताबिक प्लास्टिक पेट और आंतों में जमा होने से भोजन का पाचन प्रभावित होता है और पशु की हालत गंभीर हो जाती है। पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुनयना के अनुसार रोजाना औसतन करीब 10 पशुओं की मौत होती है, जिनमें छह से सात के पेट में भारी मात्रा में पॉलिथीन मिलने की बात सामने आती है।
शहर के फल-सब्जी और किराना बाजारों से लेकर थोक मंडियों तक प्रतिबंधित पॉलिथीन का इस्तेमाल जारी है। लोग भी बचा हुआ भोजन, सब्जियों के छिलके और गीला कचरा पॉलिथीन की थैलियों में भरकर खुले में फेंक देते हैं। गोवंश भोजन के साथ पूरी थैली ही निगल जाते हैं।
कटाक्ष यह है कि पॉलिथीन पर रोक कागजों में दिखाई देती है, लेकिन सड़क किनारे पड़े कचरे में उसकी मौजूदगी साफ नजर आती है। नगर निगम की ओर से कार्रवाई और जागरूकता अभियान तेज करने की बात कही जा रही है। नगर आयुक्त संजीव कुमार मौर्य के अनुसार पिछले वित्तीय वर्ष में कूड़ा फेंकने समेत विभिन्न मामलों में 98 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया था। अब कार्रवाई और तेज करने की बात कही गई है।
सवाल यह है कि जब प्रतिबंधित पॉलिथीन की बिक्री और इस्तेमाल पर रोक है, तो वह बाजार से निकलकर गोवंश के पेट तक कैसे पहुंच रही है? जवाबदेही तय होने तक ‘स्वच्छ शहर’ का नारा और गोवंश के पेट से निकलती पॉलिथीन—दोनों तस्वीरें साथ-साथ चलती रहेंगी।



