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जिस दीये में तेल होगा, वही रोशनी देगा

संगठन सृजन अभियान में संघर्ष की मिसाल बन गई बिजेन्द्र यादव की रावली जनसभा

गाजियाबाद। कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान के तहत पिछले 15 दिनों से जिलेभर में संगठन को बूथ और गांव स्तर तक मजबूत करने की कवायद जारी है। अभियान में जिले के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत के साथ भागीदारी की है। इसी बीच कांग्रेस के पुराने संघर्षशील दौर की कुछ तस्वीरें संगठन के समर्पण और जमीनी ताकत की याद दिला रही हैं।
ऐसी ही एक तस्वीर मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र-54 के रावली गांव की है, जहां तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय लल्लू के निर्देश पर महज तीन दिनों की तैयारी में पूर्व गाजियाबाद जिलाध्यक्ष एवं प्रदेश महासचिव बिजेन्द्र यादव ने विशाल एवं भव्य जनसभा आयोजित कर संगठन निर्माण की अपनी क्षमता का परिचय दिया था।
रावली की उस जनसभा को आज भी कांग्रेस के जमीनी संगठन और कार्यकर्ता शक्ति के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। सीमित समय में व्यापक जनसंपर्क, कार्यकर्ताओं की लामबंदी और ग्रामीण क्षेत्र में मजबूत पकड़ ने यह साबित किया था कि संगठन केवल बैठकों और पदों से नहीं, बल्कि संघर्ष, संपर्क और कार्यकर्ताओं के भरोसे से खड़ा होता है।
कांग्रेस की रीढ़, संघर्ष का चेहरा
गाजियाबाद की कांग्रेस राजनीति में बिजेन्द्र यादव को लंबे समय से जमीनी संघर्ष और संगठनात्मक सक्रियता से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच अक्सर यह बात सुनने को मिलती है—’यूँ ही कोई बिजेन्द्र यादव नहीं बन जाता।’
उनकी राजनीतिक पहचान किसी एक पद या एक आयोजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि लगातार संघर्ष, कार्यकर्ताओं के बीच मौजूदगी और संगठन को मजबूत करने की कोशिशों से बनी है। रावली की जनसभा इसी राजनीतिक सफर का एक ऐसा अध्याय है, जो आज के संगठन सृजन अभियान के बीच फिर चर्चा में है।
आज जब कांग्रेस गांव-गांव और बूथ-बूथ संगठन खड़ा करने की मुहिम में जुटी है, तब रावली की वह तस्वीर यह संदेश देती नजर आती है कि जिस दीये में तेल होगा, वही दीया अंधेरे में रोशनी करेगा। संगठन की असली ताकत वही नेता और कार्यकर्ता होते हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी मैदान छोड़ने के बजाय संघर्ष को अपनी पहचान बना लेते हैं।
रावली, मुरादनगर से उठी वह तस्वीर आज भी एक सवाल छोड़ती है—संगठन बनाने का हुनर पद से आता है या संघर्ष से?

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