पिता — वह वटवृक्ष, जिसकी छाया जीवनभर साथ रहती है – पंडित प्रमोद शर्मा
पिता… यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि सुरक्षा, विश्वास, अनुशासन, त्याग और असीम प्रेम का ऐसा संसार है, जिसे शब्दों में पूरी तरह समेट पाना संभव नहीं। पिता वह वटवृक्ष हैं, जो स्वयं धूप में खड़े रहकर अपनी संतान को जीवनभर छाया देते हैं। उनकी शाखाएँ भले ही दिखाई न दें, लेकिन उनकी छाया हमारे जीवन के हर मोड़ पर महसूस होती है।
जब बच्चा जन्म लेता है, तब पिता उसके भविष्य के सपने देखना शुरू कर देता है। वह अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर बच्चों की जरूरतों को आगे रखता है। बच्चों के चेहरे की मुस्कान में अपनी खुशी ढूँढ़ता है और उनकी छोटी-सी उपलब्धि को भी अपनी सबसे बड़ी सफलता मानता है।
पिता का प्रेम अक्सर माँ के प्रेम की तरह व्यक्त नहीं होता। माँ जहाँ अपने प्यार को शब्दों और स्पर्श से व्यक्त करती है, वहीं पिता कई बार अपनी भावनाओं को जिम्मेदारियों के पीछे छिपा लेते हैं। उनकी आँखों में चिंता होती है, लेकिन चेहरे पर विश्वास; मन में थकान होती है, लेकिन बच्चों के सामने हौसला।
बचपन में पिता की उँगली पकड़कर चलने वाला बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो जाता है। एक समय आता है जब वही बच्चा अपने पैरों पर खड़ा होकर दुनिया में आगे बढ़ने लगता है। लेकिन पिता के लिए वह बच्चा कभी बड़ा नहीं होता। उसकी चिंता, उसकी खुशी, उसकी परेशानी और उसका भविष्य हमेशा पिता के हृदय से जुड़ा रहता है।
पिता अपने बच्चों को केवल सुविधाएँ नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाते हैं। वे सिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों में घबराना नहीं, असफलता से टूटना नहीं और सफलता में अहंकार नहीं करना। उनके अनुभव हमारे लिए वह दीपक होते हैं, जिसकी रोशनी में हम जीवन के अँधेरे रास्तों को पार करना सीखते हैं।
वटवृक्ष की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह स्वयं एक स्थान पर स्थिर रहकर अनेक जीवों को आश्रय देता है। ठीक वैसे ही पिता भी अपने परिवार की मजबूती के लिए अनेक त्याग करते हैं। वे अपनी इच्छाओं को रोक लेते हैं ताकि बच्चों की इच्छाएँ पूरी हो सकें। कभी अपनी पसंद का सामान नहीं लेते, ताकि बच्चे अपनी पसंद की चीज खरीद सकें; कभी अपनी आराम की नींद छोड़ देते हैं, ताकि बच्चे चैन से सो सकें।
और सबसे सुंदर बात यह है कि पिता अक्सर अपने इन त्यागों का हिसाब नहीं रखते।
उनके पास बच्चों के लिए दिए गए समय का कोई हिसाब नहीं होता, न त्यागों की कोई सूची और न ही अपेक्षाओं की कोई लंबी पंक्ति। वे बस इतना चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे इंसान बनें, अपने पैरों पर खड़े हों और जीवन में सम्मान के साथ आगे बढ़ें।
समय बीतता है। बच्चे बड़े होते हैं, अपने-अपने संसार में व्यस्त हो जाते हैं। कभी-कभी उन्हें लगता है कि वे अब सब कुछ स्वयं कर सकते हैं। लेकिन जीवन की किसी कठिन घड़ी में जब मन टूटने लगता है, तब अचानक पिता की कही कोई पुरानी बात याद आती है—और वही बात भीतर से फिर खड़ा कर देती है।
यही पिता की सबसे बड़ी ताकत है।
पिता हमारे साथ हों तो हमें उनकी छाया की गहराई का एहसास अक्सर नहीं होता। लेकिन जब वही वटवृक्ष हमारे पास नहीं रहता, तब समझ आता है कि उसके रहते जीवन कितना सुरक्षित था।
पिता का चले जाना केवल एक व्यक्ति का चले जाना नहीं होता। घर की एक मजबूत दीवार जैसे अचानक खाली हो जाती है। आँगन वही रहता है, कमरे वही रहते हैं, वस्तुएँ वही रहती हैं—लेकिन उस घर की सुरक्षा का एहसास कहीं बदल जाता है।
फिर उनकी आवाज़ याद आती है…
उनकी डाँट याद आती है…
उनका मुस्कुराना याद आता है…
बिना कहे चिंता करना याद आता है…
और सबसे अधिक याद आती है वह भावना—कि चाहे दुनिया हमारे खिलाफ क्यों न हो जाए, पिता हमारे साथ खड़े हैं।
काश, हम पिता के रहते यह समझ पाते कि उनका मौन भी प्रेम है, उनकी डाँट भी चिंता है और उनकी कठोरता के पीछे भी हमारे उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना छिपी होती है।
इसलिए यदि पिता आज हमारे साथ हैं, तो उनके साथ समय बिताइए। उनसे बातें कीजिए। उनके पास बैठिए। उनके अनुभव सुनिए। कभी उनके कंधे पर हाथ रखकर कह दीजिए—“पिताजी, आपने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।”
हो सकता है वे मुस्कुराकर कह दें—“अरे, इसमें क्या बड़ी बात है…”
लेकिन उनके हृदय में उस एक वाक्य की खुशी बहुत गहरी उतर जाएगी।
और यदि पिता इस संसार में नहीं हैं, तो उनके संस्कारों को अपने जीवन में जीवित रखिए। उनके सपनों को पूरा करने का प्रयास कीजिए। उनके द्वारा सिखाई गई अच्छाइयों को आगे बढ़ाइए। क्योंकि पिता शरीर से दूर हो सकते हैं, लेकिन उनके संस्कार कभी दूर नहीं होते।
पिता सचमुच वह वटवृक्ष हैं, जो अपने रहते बच्चों को धूप से बचाते हैं और अपने जाने के बाद भी अपनी छाया यादों, संस्कारों और आशीर्वाद के रूप में छोड़ जाते हैं।
ईश्वर हर पिता को स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रखे।
और जिनके पिता अब इस संसार में नहीं हैं, उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन।

