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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी — जब धरती पर उतरा प्रेम, धर्म और करुणा का प्रकाश – पंडित प्रमोद शर्मा धर्म प्रचारक।

 

“जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान श्रीकृष्ण धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं।”
पंडित प्रमोद शर्मा ने बताया की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम, सत्य, कर्म और जीवन की सकारात्मकता का महापर्व है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ। आधी रात के उस पावन क्षण में जब संसार निद्रा में था, तब मथुरा की कारागार में दिव्य प्रकाश के रूप में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया।
श्रीकृष्ण का जन्म उस समय हुआ जब अत्याचार बढ़ चुका था, निर्दोष भयभीत थे और धर्म संकट में था। उनके अवतरण ने यह संदेश दिया कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य और धर्म का प्रकाश अंततः अपना मार्ग बना ही लेता है।
कृष्ण का जन्म — आशा के प्रकाश का जन्म
कंस के अत्याचार से मथुरा की जनता त्रस्त थी। अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कंस ने कारागार में बंद कर दिया था। देवकी की आठवीं संतान से अपने विनाश की भविष्यवाणी सुनकर कंस भयभीत था।
जब श्रीकृष्ण ने जन्म लिया, तब कारागार के द्वार स्वयं खुल गए, प्रहरी निद्रा में चले गए और वसुदेव जी नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार गोकुल की ओर चल पड़े।
यह प्रसंग केवल एक पौराणिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी देता है—
जहाँ ईश्वर की कृपा होती है, वहाँ बंद रास्ते भी मार्ग बन जाते हैं।
जीवन में भी अनेक बार परिस्थितियाँ हमें चारों ओर से घेर लेती हैं। लगता है कि आगे कोई रास्ता नहीं है। लेकिन धैर्य, विश्वास और सही कर्म के साथ आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अंततः अपने लिए रास्ता खोज लेता है।
गोकुल का नटखट कान्हा-
गोकुल में कृष्ण का बाल रूप भारतीय संस्कृति की सबसे सुंदर स्मृतियों में से एक है। उनकी बाल लीलाएँ—माखन चोरी, गोप-बालकों के साथ खेलना, यशोदा मैया की ममता और गोकुलवासियों के प्रति उनका प्रेम—हमें जीवन में सरलता और आनंद का महत्व सिखाते हैं।
कृष्ण ने कभी यह नहीं कहा कि आध्यात्मिक जीवन का अर्थ मुस्कुराना छोड़ देना है। इसके विपरीत, उनका जीवन बताता है कि ईश्वर के निकट वही हृदय है जिसमें प्रेम, सहजता और आनंद जीवित है।
उनकी माखन-लीला का एक सुंदर आध्यात्मिक अर्थ यह भी माना जाता है कि जैसे मंथन के बाद मक्खन निकलता है, वैसे ही मन के मंथन के बाद प्रेम और भक्ति का सार प्रकट होता है।
राधा-कृष्ण — प्रेम की दिव्यता-
पंडित प्रमोद शर्मा का कहना है कि श्रीकृष्ण और राधा का संबंध भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्तियों में माना जाता है। यह प्रेम केवल सांसारिक आकर्षण नहीं, बल्कि समर्पण, विश्वास और आत्मिक एकत्व का प्रतीक है।
राधा का कृष्ण के प्रति प्रेम हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में मांग कम और समर्पण अधिक होता है।
जहाँ प्रेम में स्वार्थ समाप्त हो जाता है, वहीं प्रेम भक्ति का रूप ले लेता है।
गोवर्धन और प्रकृति का संदेश-
श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा का संदेश देकर समाज को प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता का भाव समझाया। गोवर्धन लीला हमें याद दिलाती है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति से अलग नहीं है।
पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, पशु, वर्षा और भूमि—ये सभी हमारे जीवन के आधार हैं।
आज के समय में कृष्ण का यह संदेश और भी प्रासंगिक है कि प्रकृति का सम्मान करना भी धर्म का ही एक रूप है।
कुरुक्षेत्र में सारथी बने श्रीकृष्ण-
श्रीकृष्ण का सबसे महान स्वरूप हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में दिखाई देता है। वहाँ वे राजा या योद्धा नहीं, बल्कि अर्जुन के सारथी बने।
उन्होंने अर्जुन को जीवन का महानतम ज्ञान दिया—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार अपने कर्म पर है, उसके फल पर नहीं।
श्रीकृष्ण का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हम अक्सर परिणाम की चिंता में वर्तमान कर्म को भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण हमें सिखाते हैं कि हमारा कर्तव्य है कि हम अपना कर्म पूरी निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण से करें।
फल की चिंता ईश्वर पर छोड़कर कर्म करते रहना ही कर्मयोग है।
जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ-
पंडित प्रमोद शर्मा धर्म प्रचारक का कहना है कि जन्माष्टमी पर हम घरों और मंदिरों को सजाते हैं, झूला सजाते हैं, बाल गोपाल का श्रृंगार करते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हैं।
लेकिन इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी उत्सव नहीं है।
सच्ची जन्माष्टमी तब है, जब हमारे भीतर भी श्रीकृष्ण के विचारों का जन्म हो।
जब हमारे भीतर—
क्रोध की जगह करुणा जन्म ले,
अहंकार की जगह विनम्रता जन्म ले,
स्वार्थ की जगह सेवा जन्म ले,
भय की जगह विश्वास जन्म ले,
निराशा की जगह आशा जन्म ले,
और अधर्म की जगह धर्म का संकल्प जन्म ले।
तभी हमारे जीवन में श्रीकृष्ण का वास्तविक आगमन होगा।
आधी रात का संदेश-
श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रि में हुआ। यह भी एक सुंदर प्रतीक है।
जब बाहर का संसार अंधकार में था, तब ईश्वर का प्रकाश प्रकट हुआ।
हमारे जीवन में भी जब कभी निराशा, कठिनाई या अकेलापन छा जाए, तब हमें याद रखना चाहिए—
अंधकार ईश्वर की अनुपस्थिति का प्रमाण नहीं है; कई बार वही अंधकार प्रकाश के प्रकट होने से ठीक पहले आता है।
इसलिए कठिन परिस्थितियों में विश्वास मत खोइए। समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और ईश्वर की कृपा से जीवन में नए द्वार खुलते हैं।
इस जन्माष्टमी एक संकल्प लें-
इस जन्माष्टमी केवल भगवान से अपनी इच्छाएँ पूरी करने की प्रार्थना न करें। उनसे यह भी प्रार्थना करें—
“हे कान्हा! मुझे इतनी शक्ति देना कि मैं अपने कर्तव्य से पीछे न हटूँ।
इतना विवेक देना कि सही और गलत में अंतर समझ सकूँ।
इतना प्रेम देना कि मैं किसी के दुःख का कारण न बनूँ।
इतनी विनम्रता देना कि सफलता में अहंकार न करूँ।
और इतनी श्रद्धा देना कि विपरीत परिस्थितियों में भी आपका स्मरण न छूटे।”

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