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डी.पी. यादव : जिसे सियासत ने बार-बार परखा

लेकिन जिसका जनाधार कभी खत्म नहीं हुआ

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें केवल किसी एक दल, एक चुनाव या एक पद के आधार पर नहीं समझा जा सकता। डी.पी. यादव भी ऐसा ही एक नाम हैं। दशकों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे धर्मपाल यादव ने विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा तक का सफर तय किया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
उनके समर्थकों के लिए डी.पी. यादव केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जमीन से उठकर अपनी राजनीतिक ताकत खड़ी करने वाले नेता हैं। उनके विरोधी उनकी राजनीति को अलग नजरिए से देखते रहे, लेकिन एक बात से इनकार करना मुश्किल है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी मौजूदगी लंबे समय तक बनाए रखी।
बुलंदशहर से शुरू हुआ सफर
डी.पी. यादव ने 1989 में बुलंदशहर से विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे लगातार विधानसभा पहुंचे। आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड में उनके 1989-95 के विधानसभा कार्यकाल और 1990-91 में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहने का उल्लेख है।
यानी जिस दौर में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज अपनी जगह बना रहे थे, उसी दौर में डी.पी. यादव ने भी अपनी पहचान स्थापित की।
विधानसभा से संसद तक
डी.पी. यादव की राजनीतिक यात्रा का दायरा केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। 1996 में वे संभल से लोकसभा पहुंचे और बाद में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उनके राजनीतिक सफर में अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ काम करने के पड़ाव भी आए।
यह बात उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पहलू है—वे परिस्थितियों के साथ राजनीतिक रास्ते बदलते रहे, लेकिन राजनीति से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ।
सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़
एक दौर ऐसा भी आया जब उत्तर प्रदेश की सत्ता में डी.पी. यादव का नाम खास प्रभाव के साथ लिया जाता था। मीडिया में उस समय उन्हें बेहद प्रभावशाली नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
उनका प्रभाव केवल किसी एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में उनकी राजनीतिक पकड़ और समर्थकों का नेटवर्क उनकी पहचान का हिस्सा बना।
अपनी पार्टी बनाकर भी दिखाई राजनीतिक ताकत
राजनीति में सबसे बड़ी परीक्षा उस समय होती है जब किसी नेता के पास किसी बड़े दल का चुनाव चिन्ह और संगठन न हो।
डी.पी. यादव ने राष्ट्रीय परिवर्तन दल बनाकर अपनी राजनीतिक ताकत को अलग मंच देने का प्रयास किया। 2007 में सहसवान से विधानसभा चुनाव जीतना इस बात का उदाहरण था कि उनका राजनीतिक आधार केवल किसी बड़े दल की बैसाखी पर निर्भर नहीं था।
यही बात उनके समर्थक आज भी उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिनाते हैं।
आलोचनाओं के बावजूद राजनीतिक पहचान कायम
डी.पी. यादव के राजनीतिक जीवन के साथ विवाद भी जुड़े रहे हैं। उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों और उनसे जुड़े मामलों का उल्लेख समय-समय पर मीडिया में हुआ है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोप और न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य को एक ही मान लेना उचित नहीं है।
डी.पी. यादव के समर्थकों का तर्क रहा है कि राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन केवल विवादों से नहीं, बल्कि चुनावी संघर्ष, जनसमर्थन और सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका से भी होना चाहिए।
सवाल यह नहीं कि डी.पी. यादव को पसंद कौन करता है?
सवाल यह है कि इतने लंबे राजनीतिक सफर के बाद भी डी.पी. यादव का नाम चर्चा में क्यों बना रहता है?
इसका जवाब उनकी राजनीतिक शैली और उनके समर्थकों से जुड़े संबंधों में तलाशा जा सकता है।
उन्होंने राजनीति को केवल राजधानी के गलियारों तक सीमित नहीं रखा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जमीन पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई, चुनाव लड़े, जीते, हारे, दल बदले और फिर भी सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह गायब नहीं हुए।
यही किसी भी राजनेता की असली राजनीतिक परीक्षा होती है।
डी.पी. यादव को एक नजरिये से नहीं देखा जा सकता
किसी नेता की पूरी तस्वीर केवल उसके विरोधियों के आरोपों से नहीं बनती और न ही केवल समर्थकों की प्रशंसा से।
डी.पी. यादव के राजनीतिक जीवन में सत्ता भी रही, संघर्ष भी रहा, सफलता भी रही और विवाद भी।
लेकिन इतिहास में उनका स्थान इस बात से तय होगा कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति को कितना प्रभावित किया और आने वाली पीढ़ियां उनके राजनीतिक सफर को किस नजरिए से देखती हैं।
एक बात जरूर है—
डी.पी. यादव की राजनीति खत्म होने की घोषणा कई बार हुई, लेकिन उनका नाम हर बार किसी न किसी रूप में राजनीतिक चर्चा में वापस आया।
यही उनकी राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी कहानी है।
सियासत में कई चेहरे आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी मौजूदगी उनके पद से बड़ी हो जाती है। डी.पी. यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा ही एक चर्चित नाम हैं।

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