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जिला कांग्रेस में बदलाव के बावजूद गुटबाजी बरकरार

जिला कांग्रेस में बदलाव के बावजूद गुटबाजी बरकरार

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विजेंद्र यादव जब से कांग्रेस के जिला अध्यक्ष बने हैं तभी से उनकी कार्यशैली को लेकर कुछ लोग सवाल उठाते रहे हैं। विजेंद्र यादव की अपनी कार्यशैली है लेकिन यह भी सच्चाई है कि वह जमीन से जुड़े नेता हैं और सांगठनिक स्तर पर उनकी जबरदस्त पकड़ रही है। वर्तमान में मौजूद कांग्रेसी नेताओं में से वह अकेले ऐसे हैं जो अपने दम पर भीड़ जुटाने की क्षमता रखते हैं। हाल ही में विजेंद्र यादव ने जो जिला कमेटी घोषित की है उसमें कुछ ऐसे नाम हैं जो कांग्रेसी लंबे समय से जुड़े रहे हैं लेकिन बहुत समय से उन्हें संगठन में कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। मुरादनगर निवासी अलीमुद्दीन कस्सार और मोदीनगर क्षेत्र के गांव सीकरी कला निवासी राधा कृष्ण शर्मा को नई कमेटी में जगह मिली है। कस्सार को जिला उपाध्यक्ष और राधा कृष्ण शर्मा को महासचिव पद की जिम्मेदारी दी गई है। इन दोनों के अलावा जिला कमेटी में कई अन्य नाम ऐसे हैं जो पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता हैं लेकिन लंबे समय से उपेक्षा का दंश झेल रहे थे। यह सच्चाई है कि जिले में कांग्रेश उसी तरह गुटों में बैठी हुई है जिस तरह आज राष्ट्रीय स्तर पर गुटों में बटी दिखाई दे रही है। लंबे समय से कांग्रेस संगठन पर कब्जा किए बैठे लोग अब नई कमेटी का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस की हालत यह है कि मुरादनगर में आधा दर्जन युवा अकेले दम पर कांग्रेसका झंडा पिछले दो दशक से उठाए हुए हैं। इससे आगे न कांग्रेश कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ी है और ना ही किसी तरह की ऐसी गतिविधि दिखाई देती है जिससे पता चले कि कांग्रेश जिंदा है। यही हालत जिले के अन्य स्थानों की भी है जहां कुछ लोग कांग्रेश के नाम पर संगठन में हैं लेकिन कहीं भी ऐसा नजर नहीं आता जिसे कहा जा सकता हो कि यह कांग्रेस की गतिविधियां हैं। किसी भी तरह की जनसमस्याओं को लेकर जिला मुख्यालय के अलावा कहीं कोई मांग नहीं उठाई जाती। जहां तक बात नई कमेटी की है उसमें भी कोई बड़ा दम नजर नहीं आता। अकेले बिजेंद्र यादव के दम पर संगठन नहीं चल सकता। अलीमुद्दीन कस्सार और राधा कृष्ण शर्मा निश्चित तौर पर कांग्रेश के प्रति समर्पित हैं लेकिन दोनों का ही कहीं कोई जनाधार नहीं है। आने वाले समय में विजेंद्र यादव और उनकी जिला कार्यकारिणी के सदस्यों की परीक्षा का समय है कि वह कांग्रेस को दमदार तरीके से आगे बढ़ाते हैं या उसी पुराने ढर्रे पर पार्टी चलती रहेगी जिस तरह अब तक चल रही थी। फिलहाल कांग्रेस में ऐसा नजर नहीं आता कि गुटबाजी से इस संगठन को छुटकारा मिल सकेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस संगठन की गतिविधियां एक अकेले जिस आदमी के इर्द-गिर्द घूमती थी वह अब इस दुनिया में नहीं है। देखना होगा कि पूर्व सांसद सुरेंद्र गोयल के निधन के बाद वह खेमा किधर जाएगा जो सुरेंद्र गोयल के प्रति समर्पित था। वैसे तो सुरेंद्र गोयल का जाना कांग्रेसी ही नहीं गाजियाबाद शहर के कई संगठनों की गतिविधियों को प्रभावित करेगा।

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