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नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन परिचय आजाद हिंद फौज की पूरी कहानी

आजाद हिंद फौज की पूरी कहानी

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सुभाष चंद्र बोस देश के उन महानायकों में से एक हैं और हमेशा रहेंगे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. सुभाष चंद्र बोस के संघर्षों और देश सेवा के जज्बे के कारण ही महात्मा गांधी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था. महानायक सुभाष चंद्र बोस को ‘आजादी का सिपाही’ के रूप में देखा जाता है साथ ही उनके जीवन के वीरता के किस्सों के साथ याद किया जाता है

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था. बोस असाधारण रूप से प्रतिभाशाली थे. उन्होंने 1918 में प्रथम श्रेणी स्कोर के साथ दर्शनशास्त्र में बीए पूरा किया. बोस 1920 और 1930 के दशक के अंत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के युवा, कट्टरपंथी विंग के नेता बन गए. भगवद् गीता सुभाष चंद्र बोस के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत थी.

सुभाष चंद्र बोस के पिता चाहते थे कि सुभाष आईसीएस बनें. उन्होंने अपने पिता की आईसीएस बनने की इच्छा पूरी की. 1920 की आईसीएस परीक्षा में उन्होंने चौथा स्थान पाया, मगर सुभाष का मन अंग्रेजों के अधीन काम करने का नहीं था. 22 अप्रैल 1921 को उन्होंने इस पद से त्यागपत्र दे दिया.

दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में सुभाष चंद्र बोस ने सोवियत संघ, नाजी जर्मनी और इंपीरियल जापान सहित कई देशों की यात्रा की थी. कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस के इन यात्राओं का मकसद बाकी देशों के साथ आपसी गठबंधन को मजबूत करना था और साथ ही भारत में ब्रिटिश सरकार के राज पर हमला करना था.

कहा जाता है कि 1921-1941 की अवधि में पूर्ण स्वतंत्रता के लिए अपने रुख के कारण सुभाष चंद्र बोस को विभिन्न जेलों में 11 बार जेल की सजा हुई. उन्हें सबसे पहले 16 जुलाई 1921 को 6 महीने के कारावास की सजा दी गई. 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कलकत्ता की अदालत में पेश होना था, लेकिन वे किसी तरह अपना घर छोड़कर जर्मनी चले गए. नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी पहुंचकर वहां के चांसलर हिटलर से मुलाकात की.

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतंत्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इंडियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया. इस फौज का गठन जापान में हुआ था. इसकी स्थापना भारत के एक क्रान्तिकारी नेता रासबिहारी बोस ने टोक्यो (जापान) में की थी. 28 से 30 मार्च तक उन्हें एक सम्मेलन में आजाद हिन्द फौज के गठन को लेकर विचार प्रस्तुत करने के लिए बुलाया गया था.

बाताया जाता है कि आजाद हिंद फौज के बनने में जापान ने बहुत सहयोग किया था. आजाद हिंद फौज में करीब 85000 सैनिक शामिल थे. इसमें एक महिला यूनिट भी थी जिसकी कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन थी.

पहले इस फौज में वे लोग शामिल किए गए, जो जापान की ओर से बंदी बना लिए गए थे. बाद में इस फौज में बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किए गए. साथ ही इसमें देश के बाहर रह रहे लोग भी इस सेना में शामिल हो गए

आजाद हिंद फौज के लोगों 1944 को 19 मार्च के दिन पहली बार झंडा फहराया था. राष्ट्रीय ध्वज फहराने वाले लोगों में कर्नल शौकत मलिक, कुछ मणिपुरी और आजाद हिंद के लोग शामिल थे.

21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई. जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी. आजाद हिन्द सरकार की आजाद हिंद फौज ने ने बर्मा की सीमा पर अंग्रेजों के खिलाफ जोरदार लड़ाई लड़ी थी.

स्वतंत्रता आंदोलन की प्रथम चिंगारी 1857 में मेरठ से ही भड़की थी। जंगे आजादी के लिए लड़ने वाली हर विचारधारा से जुड़े नेता, सशस्त्र क्रांतिकारी, नरम-गरम दलों के नेता प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से मेरठ से जुड़े रहे थे लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज के कमांडरों का मेरठ से कुछ खास ही जुड़ाव रहा है।

आजाद हिन्द फौज के कमांडर-इन-चीफ नेताजी सुभाष चंद्र बोस अपने जिन सैनिकों में जोश भरने को कहानियां सुनाते थे, उनमें मंगलपांडे भी एक थे। नेताजी ने अपने भाषणों में कई बार मेरठ का जिक्र करते हुए इसे क्रांतिधरा बताया था। सुभाष चंद्र बोस 1929 में घंटाघर आए थे, जहां उन्होंने शहरवासियों को संबोधित किया था। देश आजाद हुआ तो घंटाघर का नाम नेताजी के नाम पर रख दिया गया। नेताजी ने कहा था कि मेरठ की मिट्टी वीरों को पैदा करती है। अगर बाहर का आदमी यहां का पानी पी ले तो उसका साहस सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।

 

नेताजी के बाद आजाद हिन्द फौज में दूसरा नाम मेजर जनरल शाहनवाज खान का आता है। आजादी से पहले करांची जिले के मटौर गांव में जन्मे जनरल खान ने बंटवारे के बाद कहा था कि-मैं हिन्दुस्तानी हूं, पैदा यहीं हुआ औैर दफन भी यहीं होना है। ब्रिटिश सेना में बड़ा अफसर होने के बाद भी जब नेताजी ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया तो शाहनवाज को मेजर जनरल जैसा बड़ा ओहदा सौंपा था। दुनिया के मशहूर मुकदमों में से एक था ‘रेड फोर्ट ट्रायल’। जनरल शाहनवाज खान, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और कर्नल प्रेम सहगल को लालकिले में नजरबंद कर मुकदमा चलाया गया था। मुकदमे की सुनवाई के दौरान जनता लालकिले के बाहर खड़ी होकर नारा लगाती थी कि ‘लालकिले से आई आवाज, ढिल्लन-सहगल-शाहनवाज’। दूसरा नारा था-‘लाल किले को तोड़ दो, ढिल्लन-सहगल-शाहनवाज को छोड़ दो’। मुकदमे में तीनों को बाइज्जत बरी किया गया था और तीनों ही देश में नायक बनकर उभरे थे। आजादी मिली तो पंडित नेहरू के कहने पर जनरल शाहनवाज ने मेरठ से लगातार चार बार चुनाव लड़ा और जीते। इस दौरान वह उद्योग, रेलवे और कृषि सरीखे मंत्रालयों के मंत्री भी रहे। अंतिम सांस तक मेरठ से जुड़े रहे। जनरल शाहनवाज ने आजादी के बाद हुए लगातार चार चुनावों में मेरठ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था।

 

 

 

 

 

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