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मरहूम शायर राहत इंदौरी साहब को विनम्र श्रद्धांजलि

मरहूम शायर राहत इंदौरी साहब को विनम्र श्रद्धांजलि

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वबा फैली है चारों तरफ, मरने का नई।
वो बुलाती है मगर, जाने का नई।
गाजियाबाद। वबा यानी कि महामारी के इस दौर में ना जाने की बात करते-करते मशहूर शायर राहत इंदौरी खुद ही इस पानी दुनिया से रुखसत हो गए फानी दुनिया से रुखसत हो गए। कल से जब उनके निधन की खबर चारों तरफ फैली तब से उनके इस शेर के साथ-साथ एक दूसरा शेर भी बहुत वायरल हुआ है। वह शेर है।
दो गज जमी ही सही मिल्कियत तो है मेरी।
ए मौत तूने मुझे जमीदार कर दिया।
राहत इंदौरी साहब ऐसे शायर थे जिनका अंदाज ए बयां ही सुनने वालों को उस मंच तक आने के लिए मजबूर कर देता था जहां वह अपना कलाम पढ़ने के लिए मौजूद होते थे। आज उनको लेकर बहुत कुछ लिखा गया है। हाल ही में कोरोना संक्रमण को लेकर पत्रिका इंडिया टुडे के 22 जुलाई के अंक में उनका एक साक्षात्कार प्रकाशित हुआ है। यहां हम प्रस्तुत कर रहे हैं उस साक्षात्कार के कुछ चुनिंदा अंश

राहत साहब के साक्षात्कार की शुरुआत है की जंजीर की लंबाई तक महदूद होकर रह गई है जिंदगी। सारी उम्र में पहला मौका आया है कि घर की दीवारों को इतने नजदीक से देखा है। हमारी मजहबी किताबों में खुदा को पहचानने की जो परिभाषाएं लिखी हैं उसमें यह भी है कि अपने इरादों को टूटने से अपने खुदा को पहचानो। मैं समझता हूं कि सारी दुनिया के लोगों को समझना चाहिए कि कुदरत को पहचानने का यह भी एक तरीका है। कोरोना संक्रमण से पहले को लेकर राहत साहब कहते हैं कि इस वक्त अकेलापन तन्हाई सन्नाटे और खामोशियां तो हैं लेकिन यह वह तन्हाई नहीं है जो किसी रचनाकार को उर्जा प्रदान करती है। कुछ तखलीकी यानी कि रचनात्मक अमल के लिए आमादा करती हो। यह वह तनहाई नहीं है जहां बुद्ध को इल्म प्राप्त हो जाता है। यह गारो की तनहाइयां नहीं है जहां अजंता और एलोरा की तखलीक हो जाती है। मैं समझता हूं यह फोन की तन्हाई है मौत और डर की तन्हाई है। कुछ समझने और सोचने की तन्हाई जरूर है लेकिन वह शायद गजल और शायरी के लिए आमादा नहीं करती। यह एक ऐसा कैनवस है जिस पर सिर्फ मातम की तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, खुशियों की नहीं। कुदरत राह का पत्थर नहीं बल्कि रास्ते की निशानी बनकर रहबर बनकर इशारे कर रही है कि क्या हो सकता है और क्या नहीं हो सकता। जो नहीं सोचते वह भी हो सकता है। इसके बावजूद इंसान कुछ सबक नहीं ले रहा तो यह उसकी बदनसीबी है।मैं तो सबको यही हिदायत दूंगा कि हर एक दिन जो हमने गुजारे हैं। इस माहौल के हर दिन से हमें सबक लेना चाहिए और जिंदगी की कदर करनी चाहिए।
इस साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा है कि जिंदगी किसी भी परेशानी के दौर में कुछ दिन तब्दील होती है,थोड़ी अनुशासित होती है और आदमी फिर उसी ढर्रे पर आ जाता है। साथ ही उन्होंने कहा है कि इस आफत से निजात के लिए सरकार मेडिकल साइंस और दूसरे लोग अपने अपने तरीके से रास्ते खोज रहे हैं। हमें उनकी कामयाबी का इंतजार करना चाहिए और इस धुन्ध का सामना करने तक हमें बहुत ही अनुशासित रहना चाहिए।
आखरी लाइनों में जो सीख उन्होंंने हमें दी है उस पर चलना ही राहत साहब को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। आमीन।

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