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गरीब मुस्लिमों की विरोधी है संविधान की धारा 341

21 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सेक्युलर देश मे धारा 341 पर लगी इस तरह की शर्त का औचित्य पूछा

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आज ही के दिन 10 अगस्त 1950 को धारा 341पर धार्मिक प्रतिबन्ध लगाया गया था।

अनुच्छेद 341 का पैराग्राफ 3 भारतीय संविधान में काला धब्बा है जो धर्म के आधार पर इसी देश के नागरिकों (अनुसूचित मुसलमानों एवं अनुसूचित ईसाईयों ) अलग थलग करता है जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद, 14, 15, 16 और 25 के तहत मुस्लिम और ईसाई दलितों को दिए गए अधिकार का उल्लंघन करता है।

धारा 341 का पैराग्राफ 3 अन्यायपूर्ण, दमनकारी, जनविरोधी, असंवैधानिक तथा काला कानून है, जो धर्म के आधार पर मुसलमानों एवं ईसाइयो में गरीब, सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक स्तर पर पिछड़े एवं दैनिक जीवन-यापन करने वालों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए संविधान द्वारा आरक्षण से वंचित करता है..ये संविधान का दोहरा चरित्र है।

देश कि आज़ादी का पहला उद्देश्य देश के सभी वर्गों की सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक विकास के लिए सामान अवसर उपलब्ध कराना था | धर्म जात, वर्ग, नश्ल, लिंग , भाषा के भेदभाव के बिना सभी पिछड़े वर्गों के पिछड़ेपन को दूर करने और जीवन अस्तर को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण की सुविधा दी गयी जिसका उद्देश्य उन पिछड़े वर्गों और अधिकारों से वंचित जनता को सहयोग दिलाना था जो सदियों से अन्याय के शिकार रहे आज़ाद भारत की पहली  सरकार जिसका नेतृत्व पंडित जवाहर लाल नेहरू कर रहे थे,उसने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ भेद भाव करते हुए धारा 341 में धार्मिक प्रतिबन्ध लगा कर भारतीय संविधान के सिद्धांतो की खिलाफत की है । मेरा ये  मानना है कि धर्म आरक्षण का आधार नहीं होना चाहिए जैसा कि संविधान कहता है आरक्षण से सम्बंधित भारतीय संविधान की धारा 340 ,341 और 342 है जिनमे स्पष्ट रूप से कही धर्म शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। आरक्षण के सभी लाभ जाति और पेशे के आधार पर निर्धारित किये गए है धार्मिक मान्यताओ या किसी विशेष धर्म से सम्बंधित होने के आधार पर न तो किसी को आरक्षण की सुविधा दी जा सकती है और न ही उसको आरक्षण के लाभ से वंचित किया जा सकता है ।यह आश्चर्य एवं चिंता जनक बात है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू की नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 10 अगस्त 1950 को एक अध्यादेश पास कराया जिसे कंस्टीटूशन (अनुसूचित जाति ) आदेश 1950 कहा जाता है जिसके पैरा – 3 में स्पष्ट किया गया है कि कोई व्यक्ति जो हिन्दू धर्म को छोड़ कर किसी और धर्म को स्वीकार करता है वह अनुसूचित जाति नहीं माना जायेगा ,अनुसूचित जाति किसी ऐसे व्यक्ति को आरक्षण की सुविधा नहीं मिलेगी जो गैर हिन्दू होगा इस अद्ध्यादेश का अर्थ था कि अनुसूचित जाति (दलित जाति ) के मुसलमान

ईसाई शिख ,बौद्ध जैन और दूसरे धर्म के मानने वाले लोगो को आरक्षण का लाभ उठाने वालो की सूची से बाहर कर दिया जाये जबकि 1936 से 1950 तक तमाम लोग सामान्य रूप से आरक्षण का लाभ उठा रहे थे ,सिक्ख समाज के लोगो ने इस के विरुद्ध आवाज़ खड़ा किया तो 1956 में उक्त अद्ध्यादेश में संशोधन करते हुए सिख तथा वर्ष 1990 में बौद्ध दलितों को भी आरक्षण के अंतर्गत लाया गया ,लेकिन मुसलमान व ईसाई दलितों को आज भी वंचित रखा जा रहा है , इस प्रकार असंवैधानिक अलोकतांत्रिक, अन्याय व अत्याचार पर आधारित नीति का प्रयोग करके दलित मुसलमानों और दलित ईसाइयों को आरक्षण के अधिकार को छिन लिया गया ,जो उन्हें सविंधान द्वारा प्राप्त था ,इस भेदभाव के कारण देश का मुसलमान इतना पिछड़ गया कि सामाजिक , आर्थिक एवं शैक्षिक स्थित को जानने के लिए जस्टिस राजेन्द्र सच्चर के नेतृत में कमेटी बनाई गयी,सच्चर कमेटी इस नतीजे पर पहुंची कि उसे अपनी रिपोर्ट में लिखना पड़ा कि आज देश में मुसलमानो कि सामाजिक ,आर्थिक एवं शैक्षिक स्थिति दलितों से भी बदतर है, मेहतर,मूची ,खाटी,धोबी ,नट,लालबेगी ,डफाली,हलाल खोर , हेला ,आदि ऐसी बहुत सारी मुस्लिम व ईसाई दलित जातिया है जो हिन्दुओ की तरह उनके जैसे पेशे से जुडी है लेकिन हिन्दू दलित जातिया सरकारी नोकरियों ,राजनीति ,शिक्षा व रोज़गार आदि में आरक्षण में लाभ पाती है जबकि वही पेशा करने वाले मुसलमान व ईसाई जातिओं को उससे वंचित रखा गया है मेरा ये मानना है कि एक जैसा पेशा करने वाले तमाम लोगो को समान अवसर मिलना चाहिए, यह हर भारतीय का जन्मसिद्ध अधिकार है तथा धारा 341 से धार्मिक प्रतिबन्ध ख़त्म होना चाहिए। जस्टिस सच्चर ने भी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट मे लिखा था “अनुसूचित जाति की परिभाषा को धर्ममुक्त किया जाए। संसद में एक सरल प्रस्ताव द्वारा 1950 के अध्यादेश में संशोधन करके पेराग्राफ़ 3 को उस में से निकाल दिया जाए l”

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(सच्चर समिति का सुझाव, गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी)

 

दरअसल भारत मे दोगलापन का सबसे बड़ा शीकार मुसलमान है,

आरक्षण विरोधी धारा 341से सभी लोग भलीभांती परिचित है कि किस तरह मुसलमानो के साथ धर्म के आधार पर आरक्षण मे भेदभाव किया गया,दोस्तों किसी भी समाज के सर्वागीण विकास के लिए एक विशेष बातबहुत जरूरी होती है,

वो है ”ऱाजनैतिक और प्रशासनिक हिस्सेदारी”

भारत का मुसलमान जातिवाद   और फिर्काफरस्ती से घिरा हुआ है,राजनैतिक हिस्सेदारी के लिए सबसे अहं है सामाजिक एकता/इत्तिहाद

जब तक हम फिर्काफरस्ती से बाहर नही होंगे राजनैतिक रूप से हमे ताकत नही मिलेगी,ये सोचने वाली बात है भारत मे लगभग 18 करोड मुसलमान होने के बाबजूद गीने चुने सांसद(जनप्रतिनिधि) है,उसमे भी अधिकतर पार्टी के प्रति वफादार है न कि कौम के प्रति!

पार्टीपरस्ति होने की वजह ज्यादातार मुस्लिम राजनेता कौम के मुद्दों पर चुप रहते है,तभी तो इतने सालो मे आरक्षण के लिए बड़ा आन्दोलन नही हो पाया,तभी तो इतने सालो मे धारा 341 पर जोरदार आवाज नही उठाई गई

तभी तो लगातार एक के बाद एक घटना होती रही,क्युकि भारत की ज्यादातर राजनैतिक  पार्टियो के लिए मुसलमान सीर्फ वोटबैंक है,ये पार्टियॉ जानबूझकर मुसलमानो को सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक रूप से कमजोर करती रही है, भारत मे 18 करोड मुसलमान होने के बाद भी सीर्फ जम्मू &कश्मीर मे ज्यादातर वक्त मुस्लिम मुख्यमंत्री रहा है,इसके पीछे दो ही कारण है,या तो मुसलमानो मे योग्य नेत्तृव का अभाव है,या पार्टियॉ नही  चाहती कि मुसलमानो मे लीडरशीप विकसीत हो,लेकिन नेत्तृव की क्षमता अवसर मीलने पर ही आती है ,इसलिए मुझे दुसरा कारण नजर आता है ,मुझे लगता है मुस्लिम कौम ब्राह्मणवाद विचारधारा का शिकार होती रही है,

दोस्तों समय की जरूरत है हम राजनैतिक रूप से इत्तिहाद करे,कौम की यूथ लीडरशीप को आगे बढाये,इसके लिए सबसे जरूरी है हम फिर्काफरस्ती ,जातीवाद छोडकर सब लोग  एक जाजम पर आये,

 

कौम के विकास के लिए प्रशासनिक भागीदारी,सरकारी नौकरियो मे भागीदारी भी अति आवश्यक है,धरातल पर जो सरकारी योजनाए आती है उनको लाने वाले प्रशासनिक अधिकारी होते है,हर अधिकारी अपने समाज की कमियों से भलीभांति वाकिफ होता है,यथासंभव सुधारने की कोशिश भी करता है,दोस्तों मै आपको अलग अलग राज्यो मे मुस्लिम जनसंख्या के अनुपात मे सरकारी ऩौकरियो मे मुसलमानो की भागीदारी के ऑकडे दिखाता हूँ,

मुस्लिम आबादी और सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी

पश्चिम बंगाल-आबादी 25.2% नौकरी 2.1%

केरल- आबादी 24.7% नौकरी 10.4%

उत्तर प्रदेश-आबादी 18.5% नौकरी 5.1%

बिहार-आबादी 16.5% नौकरी 7.6%

असम- आबादी 30.9% नौकरी 11.2%

झारखंड-आबादी 13.8% नौकरी 6.7%

कर्नाटक-आबादी 12.2% नौकरी 8.5%

दिल्ली-आबादी 11.7% नौकरी 3.2%

महाराष्ट्र-आबादी 10.6% नौकरी 4.4%

आंध्रप्रदेश-आबादी 9.2% नौकरी 8.8%

गुजरात-आबादी 9.1% नौकरी 5.4%

तमिलनाडु-आबादी 5.6% नौकरी 3.2%

यहॉ आप पश्चिम बंगाल और कर्नाटक का आकडॉ देखिये

पश्चिम बंगाल में जहाँ मुसलमानों की आबादी 25.2 प्रतिशत है वहीं सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी महज़ 2.1 प्रतिशत है. वहीं कर्नाटक में मुसलमानों की आबादी 12.2 प्रतिशत है जबकि सरकारी नौकरियों में उनकी सहभागिता 8.5 प्रतिशत है.”

दोस्तों सरकारी नौकरियों मे भागीदारी के लिए आरक्षण अति आवश्यक है,मुस्लिम समुदाय शिक्षा के प्रति भी कतई जागरूक नही है,विशेषकर महिला शिक्षा के प्रति , लेकिन आरक्षण से समाज मे एक चेतना आयेगी,युवाओं में सरकारी नौकरियो के लिए उत्सुकता बढेगी,युवा पहले से ज्यादा मेहनत करेगे और अगर सरकारी नौकरियो मे मुसलमानो की भागीदारी बढती है समाज आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त होगा!

आरक्षण आने वाली पीढी के उज्जवल भविष्य के लिए बेहद जरूरी है,क्युकि आरक्षण से ही हमे हमारी जनसंख्या के अनुपात मे हक मील सकता है नही तो हमारा हक कोई और मारता रहेगा!

जब तक मुस्लिम मजबुत नही होंगे,देश भी मजबूत नही होगा

दोस्तों विकास की दौड़ में पिछड़ चुके मुसलमानों को जबतक देश के विकास में हिस्सेदार नहीं बनाया जाता है उस वक़्त तक भारत की तरक़्क़ी भी अधूरी है. हर हाल मे मुसलमानों को आरक्षण दिया जाना चाहिए ,रंगनाथ मिश्रा,सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के पूरे सुझावों पर अमल किया जाना चाहिए, आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को हटाया जाना चाहिए और धारा 341(3) में संशोधन कर मुसलमानों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए.”

मै तो यही कहुगाॅ काग्रेस का दोगलापन था कि 1950 में राष्ट्रपति अध्यादेश के ज़रिए धारा 341 पर प्रतिबंध लगाकर सभी अल्पसंख्यकों को अनुसूचित जाति से ख़ारिज कर दिया , और  बाद में सिखों और नवबौद्घों को इस धारा में संशोधन कर अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया, लेकिन मुसलमान और ईसाई को इससे अब भी बाहर रखा गया है.सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी चिल्ला चिल्लाकर कहती है”मुसलमान आर्थिक दृष्टिकोण से अनुसूचित जातियों के लगभग बराबर हैं जबकि शैक्षणिक स्तर पर वो उनसे भी पिछड़े हुए हैं.”सिर्फ आरक्षण मुसलमानों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है. देश में मुस्लिम केंद्रित ज़िलों में केंद्र सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओ मे भी भारी नाकामी रहती है, सरकारी योजनाओं का फ़ायदा मुसलमानों तक ठीक तरह से नही पहुच पाता,

इसके लिए भी जरूरी है स्वतंत्र निगरानी एजेंसी के गठन का हो, मेरी राय है मुसलमान वोट को हथियार बनाये और वो उसी पार्टी को वोट दें जो आरक्षण देने का समर्थन करे,आरक्षण दें, मै मुसलमानों की मौजूदा स्थिति के लिए राजनीतिक पार्टियों को दोषी मानता और मुझे इनकी नीयत पर भी  शक है, हमे आरक्षण नहीं मिलने में सबसे बड़ी रुकावट दोगली  सरकारों  की नीयत में खोट है,

शरीफ मोहम्मद खिलजी

राष्ट्रीय प्रवक्ता – मुस्लिम महासभा

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