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कुम्हारों के आंसू थम नहीं रहे यूपी सरकार से भी कोई भी मदद नहीं हो रही हैं

कुम्हारों के आंसू थम नहीं रहे यूपी सरकार से भी कोई भी मदद नहीं हो रही हैं

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कबीर दास जी का यह दोहा सटीक साबित हो रहा है ।

माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोहे एक दिन दिन ऐसा आएगा मैं रो दूंगी तोय

गाजियाबाद जहां देशभर में कोरोना वायरस कोविड-19 के आक्रमण से देश दुनिया मे महामारी का माहोल बन गया वायरस ने दुनिया को पूरी तरह से झिझोड़ कर रख दिया इस घातक कोरोना वायरस से बचने के लिये सरकार ने लॉकडाउन का सहारा लिया कही ना कही लगातारलॉकडाउन रहने से सभी तरह के उद्योग व व्यापारो पर बुरा असर दिखा अगर हम बात करे मट्टी के बर्तन और खिलौने बनाने वाले कुम्हरो की जिनका व्यवसाय यही है । लगभग लगभग सभी तरह के कुम्हरो को लॉकडाउन का खामियाजा चुकाना पड़ा ऐसे में अगर हम बात करें कुम्हारों की जो मिट्टी के खिलौने व बर्तन बनाकर बेचते थे उनकी तो रोजी-रोटी कोरोना वायरस ने पूरी तरह से छीन ली हो।
हकीकत है कुम्हारों की अगर बात करें तो लागडाउन का पहला चरण से लेकर अब तक पूरी तरह से उन दुकानदारों कि कमर तोड़ दी कुम्हारों की रोजी-रोटी पर पानी फिर गया ऐसे में ही देश भर मे अनलॉक होने से अपने कारोबारो को फिर से पतरी पर लाने के लिए आर्थिक मदद् कि जरूरत है जो इन कुम्हारों के पास अब तक कोई मददगार नही पहुचा।

गाजियाबाद की नगर कोतवाली के अंतर्गत का है जहां कुम्हारों की बस्ती में कुम्हार किस तरह उनके आंखों से आंसू उभर रहे है।
अगर हम बात करें कुम्हारों को तो वाकई एक चिंताजनक की बातें हैं कि अब तक ऐसे बेरोजगार के पास आर्थिक मदद के लिए न ही कोई राजनेता दल आया और ना ही जिलाप्रशासनकाकोईआश्वासन मिला।जिसे इनकी बाकी बची रुखी सूखी जिन्दगी को फिर से पटरी पर लाया जा सके।ऐसे में इन कुम्हरो के लिये सरकार अभी तक कुछ कर क्यो नही रही है।
केवल चन्द कागजों में ही गरीब मजदूर को लाभ मिलेगा या फिर जमीनी स्तर पर दिखाई देगा।
एक कुम्हार जिनकी उम्र लगभग 60 वर्ष की है । मिट्टी के खिलौने बर्तन बना कर बेचना उनका बस एक ही रोजगार और पेसा है जिनसे 2,4 पैसे कमा कर अपने परिवार का पालन पोषण होता है । इसी दौरान इन्होंने बताया लॉकडाउन में बहुत ही ज्यादा असर हम लोगों के कामों पर पड़ा बना हुआ माल कोई खरीदने को तैयार ही नहीं ऐसे में सभी बने हुए मिट्टी के खिलौने व बर्तन रखे रखे खराब वह फूट गया। सिर्फ गर्मी की वजह से मटके ओर सुराही बिक रही है । विवाह शादी अन्य धार्मिक कार्य में जहां मिट्टी के बर्तन प्रयोग होते थे वह भी अब नहीं हो रहे हैं । कुम्हरो ने साफ कहा कि हमारे बच्चे घर कि महिलायें हम सभी भट्टे का ईट अपने कंधों पर ढोकर किसी तरह का गुजारा किया जा रहा है ।

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