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Mumbai First Don करीम लाला

Mumbai First Don करीम लाला

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लोगों के बीच में जब भी कभी अंडरवर्ल्ड डॉन का जिक्र होता है, तो लोग हमेशा दाऊद इब्राहिम का ही नाम लेते हैं। मगर हकीकत में जो डॉन नाम का शब्द आया था, वो कहीं और से आया था। कुछ लोग हाजी मस्तान को मुंबई का पहला डॉन मानते हैं। हकीकत में Mumbai First Don करीम लाला था। इस बात का इकरार खुद हाजी मस्तान ने भी किया है।
इस कहानी की शुरुआत करीब 1925-35 के बीच में हुई। करीम लाला असल में हिंदुस्तानी नहीं था। वह अफगानिस्तान का रहने वाला था। वह अफगान में ही पैदा हुआ था। वह अफगानिस्तान में एक जगह है। वहां पर पैदा हुआ था। एक शाही परिवार में पैदा हुआ था। उनका अच्छा खासा कारोबार था। उस वक्त हिंदुस्तान आजाद नहीं हुआ था। हिंदुस्तान अंग्रेजो के कब्जे में था। करीम लाला का असली नाम अब्दुल करीम शेरखान था।
करीब 21 साल की उम्र में अब्दुल करीम शेरखान यानी करीम लाला पेशावर पहुंचा। क्योंकि पेशावर भी उस वक्त हिंदुस्तान में ही था। उस वक्त हिंदुस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था। पेशावर के रास्ते वह मुंबई पहुंच गया। मुंबई का नाम उस वक्त बॉम्बे हुआ करता था। मुंबई आने के बाद करीम लाला का सबसे पहला ठिकाना ग्रैंड ट्रंक रोड था। यहां पर उसने अपना एक किराए का घर लिया। वहीं पर उसने अपना कारोबार शुरू किया। मगर इसका असली कारोबार एक जुए का अड्डा था। यह वहां पर जुए का अड्डा चलाने लगा। जुआ का अड्डा चलाते-चलाते इसके पास काफी पैसे आ गए। उस वक्त तक मुंबई में कोई गैंग या डॉन नाम की कोई चीज नहीं थी। वहां पर उस वक्त छोटा-मोटी गुंडा गुंडागर्दी चलती रहती थी। यह आमतौर पर हर जगह होती है।
इसी के साथ-साथ करीम लाला ने लोगों को ब्याज पर पैसा देना शुरू कर दिया। उसने धीरे-धीरे शराब के अड्डे भी खोलिए। यह सारी चीजें चलती रही। पुलिस को भी इन सब चीजों के बारे में पता चल गया। मगर करीम लाला हमेशा यह सोचता था। दुश्मन को भी दोस्त बनाकर काम किया जाए। फिर उसने पुलिस वालों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। उनको अपना दोस्त बना लिया। उनको उनका हिस्सा दे दिया करता था।
तकरीबन 1940 में जब तक हिंदुस्तान अंग्रेजों के चंगुल से आजाद नहीं हुआ था। हीरे और सोने की तस्करी की काफी डिमांड चल रही थी। यह सिर्फ छोटे-मोटे पैमाने पर चल रहा था। लेकिन जब करीम लाला का इस तरफ ध्यान गया। उसने सोचा क्यों ना हम भी सोने और हीरे की तस्करी का काम करें। यह सोचकर उसने हीरे और सोने की तस्करी का काम शुरू कर दिया। इस हीरे और सोने की कमाई से उसे काफी आमदनी होने लगी।
इन पैसों के साथ उसका कद बढ़ता गया। उन लोगों से हफ्ता वसूली वगैरह भी करने लगा। यहां तक कि वह एक तरीके से वहां का दादा बन गया था। यह करते-करते उसने अपना एक नया गैंग शुरू कर दिया। उस गेम का नाम पठानी गैंग था। वह हमेशा पठानी सूट पहना करता था। मगर जब उसका कद बढ़ना शुरू हो गया। उसने पठानी सूट छोड़कर सिर्फ सूट पहनना शुरू कर दिया। लगभग अब करीम लाला मुंबई का एक बहुत बड़ा नाम बन चुका था। उसके सामने कोई रुकावट नहीं थी।


इसी के बाद एक और शख्स सामने आता है। उसका नाम हाजी मस्तान था। हाजी मस्तान ने भी तस्करी का काम करना शुरू कर दिया। हाजी मस्तान को पता था कि इस पूरे काम को चलाने वाला करीम लाला है। करीम लाला की मर्जी के बगैर यह काम करना मुश्किल था। क्योंकि हाजी मस्तान और कलीम करीम लाला के मिजाज आपस में मिलते थे। दुश्मनी करके काम नहीं करेंगे। हाजी मस्तान और करीम लाला में दोस्ती हो गई। एक समझौता हो गया। समझौता यह था कि समुद्री इलाका जहां-जहां से माल उतरता है।
वह तुम्हारा और बाकी का माल हमारा। पठानी गैंग उस माल को उतारने में मदद कर देगी। उसमें जो तुम्हारा हिस्सा होगा वह तुमको मिल जाएगा। यह दोनों में समझौता हो गया। दोनों गैंग बड़े प्यार से अपना धंधा चलाने लगे। धीरे-धीरे करीम लाला और हाजी मस्तान में दोस्ती भी हो गई। बिल्कुल सही चल रहा था मुंबई के लगभग 2 हिस्से हो चुके थे। जिसमें एक तरफ हाजी मस्तान काम कर रहा था। दूसरी तरफ करीम लाला।
करीम लाला ने मस्तान का ध्यान भी अपनी तरफ खिंचा क्योंकि मस्तान के पास सब कुछ तो था, लेकिन बिना बाहुबल मुम्बई पर राज नहीं किया जा सकता और उसे बाहुबल मिल सकता था तो करीम लाला से। 1940 का यह वो दौर था जब मुंबई में हाजी मस्तान और वरदाराजन मुदलियार उर्फ वरदा भाई भी सक्रीय थे। तीनों ही एक दूसरे से कम नहीं थे। इसलिए तीनों ने मिलकर काम और इलाके बांट लिए थे। करीम लाला की जानदार शख्सियत को देखकर हाजी मस्तान उसे असली डॉन के नाम से बुलाया करता था। तीनों बिना किसी खून खराबे के अपने अपने इलाकों में काम किया करते थे। उस दौरान इनके अलावा मुंबई में कोई गैंगस्टर नहीं था।
अस्सी के दशक तक लाला का दबदबा कायाम था हालांकि लाला अब ज्यादा सक्रिय नहीं रहता था।

इसके बाद मुंबई अंडरवर्ल्ड में दाऊद की एंट्री हुई। 1981 से 1985 के बीच करीम लाला गैंग और दाऊद के बीच जमकर गैंगवार होती रही यहां तक की दिनदहाडे खून खराबे होने लगे। नतीजा यह हुआ कि दाऊद इब्राहिम की डी कंपनी ने धीरे धीरे करीम लाला के पठान गैंग का मुंबई से सफाया ही कर दिया।
इस गैंगवार में दोनों तरफ के दर्जनों लोग मारे गए। लेकिन आज भी लोग करीम लाला को ही मुंबई अंडरवर्ल्ड का पहला डॉन मानते हैं। हाजी मस्तान और करीम लाला की दोस्ती भी लोगों के बीच मशहूर रही। 90 साल की उम्र में 19 फरवरी, 2002 को मुंबई में ही करीम लाला की मौत हो गई थी और साथ ही खत्म हो गया मुम्बई माफिया का एक दौर।

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