Breaking Newsउत्तर प्रदेशहमारा गाजियाबाद

पूर्व मंत्री की दास्तान

पूर्व मंत्री की दास्तान

image_pdf

मैं पेशे से वकील था। एम एम एच कालिज से एलएलबी पास करने के बाद 1972 में मैंने वकालत प्रारम्भ कर दी थी।तब तक गाजियाबाद जिला नहीं बना था,ये मेरठ जनपद की एक तहसील थी। दीवानी न्यायालयों में सिविल जजी गाजियाबाद में स्थापित थी बल्कि बागपत तहसील की सिविल जजी भी गाजियाबाद में ही थी।

इसलिए दीवानी में काम ज्यादा था। हम तो सभी काम करते थे सिविल क्रिमिनल ,रेवेन्यू सभी तरह के केस ले लेते थे। वकालत की ट्रेनिग हमने श्री रामशरण शर्मा जी से ली थी। साल छः महीने बाद ही शर्मा जी के परामर्श पर ही हमने अपना काम अलग कर लिया था। उन दिनों फूंस की झौंपड़ियो के चैंबर होते थे। नवरंग सिनेमा के पीछे एसडीएम कोर्ट कम्पाउंड था उसी में मैंने भी चैंबर ( बस्ता) बनाया था।

हम कोई शार्प माइंड और पढ़ाई लिखाई में तेज नहीं थे। मिडियोकर ही थे। लेकिन तैयारी के बाद अपनी बात ठीक से कह पाते थे।भाषण की कला में तो विद्यार्थी काल मे ही पारंगत हो गए थे। राजनीति का चस्का भी पहले से था लेकिन एमएलए या एमपी बनने के सपने नहीं थे। राजनीति में सक्रियता के कारण वकालत में पूरा समय नहीं दे पाते थे लेकिन अपनी जीविका का साधन वकालत ही था। इसलिए अभावों में रहने का अभ्यास हो गया था।

राजनीति में सम्मान तो बहुत मिलता है लेकिन राजनीति महंगी बहुत है। साधन ,समय ,स्वास्थ्य , परिवार सभी की कीमत  पर राजनीति करते रहे उसी कारण से वकालत में भी पूरे मनोयोग से काम नहीं कर पाए। मुझे लगता है कि वकालत पार्ट टाइम जॉब नहीं है ,पूरे समय और पूरी निश्ठा से जब आवश्यक हो अपने क्लाइंट को उपलब्ध रहो तो फिर वकालत ठीक चलती है। हमे वकालत में चौ हरपाल सिंह निर्भय का बड़ा मार्ग दर्शन मिलता था। वे अपना काम छोड़कर भी हमारी पलिंडिंग्स लिखवा दिया करते थे। वैसे हमें ये विशेषाधिकार और स्नेह भी था कि जिससे जब चाहा पूछ लिया करते थे। रैवेयु के मामलों में श्री हरिसिंह गहलौत से भी पूछते रहते थे।

हमें दो बार 1983-84 और 1985- 86 में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहने का अवसर मिला। दोनों बार चुनाव हुए ,एक बार हरिश्चंद्र भाटी जी से और एक बार भारतेंदु शर्मा जी से। वैचारिक रूप से हम जनसंघ / भाजपा से जुड़े थे लेकिन स्वभावगत सभी के साथ सम्मान का व्यवहार करते थे और पाते भी थे। श्री रामकुमार भाटी जी से विद्यार्थी काल से ही सम्पर्क था और योगेंद्र पंवार ,एसपी चौधरी ,हामिद अली सत्यकेतु जैसे कई युवा वकीलों से कुछ प्रगाढ़ता ज्यादा ही हो गई थी।

हमसे पहले बार एसोसिएशन एक निष्क्रिय संस्था थी। सम्भवतः किसी विवाद के समय ही उसका अस्तित्व पता चलता था। हमने उसे जीवंत संस्था बनाया । पहली बार अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद इंस्टॉलेशन फंक्शन का आयोजन किया। 15 अगस्त और 26 जनवरी को बार मे झंडा फहराने और कार्यक्रम रखने की परम्परा प्रारम्भ की।उस बार ही एक बड़ा आयोजन किया ,बार एसोसिएशन की गोल्डन जुबली मनाई। जिसके मुख्य अतिथि भारत के पूर्व प्रधान मंत्री चौ चरण सिंह जी थे और भारत के पूर्व कानून मंत्री श्री शांति भूषण ,सर्वोच्च न्यायालय के सुपरसीडीड न्यायाधीश जस्टिस एच आर खन्ना और इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पीएस गुप्ता थे। कार्यक्रम दो दिन चला। खर्च की व्यवस्था के लिए एक स्मारिका भी प्रकाशित की जिसमें विज्ञापन लिए गए ,खर्च से बचे पैसों से बार के लिए कुछ पुस्तकें खरीदी। सभी इवेंट्स के लिए अधिवक्ताओं की कमेटी बनाई गई थी। सभी सीनियर्स का भी सहयोग रहा।

दूसरे कार्यकाल में जीडीए से अधिवक्ताओं के लिए 70 आवास बनवाये गए ,नीति नगर संजय नगर सेक्टर 23 में एल शेप में आवास बने हैं । ये सम्भवतः देश मे पहली घटना होगी जहां केवल वकीलों के लिए मकान बना कर दिए गए हों। आज भी बहुत सारे वकील वहां रहते हैं। मजे की बात ये रही कि किसको कौन सा आवास मिले ये निर्णय भी मुझ पर ही छोड़ दिया था। लगभग आम सहमति से सभी को आबंटन किया गया। मैंने अपने लिए उसमें आवास नहीं लिया क्योंकि मेरे पास पहले ही नेहरू नगर में आवास था। अपनी प्रशंसा करना अच्छा नहीं लेकिन लोभ का संवरण हमने पहले से किया हुआ था।आज जहां राजनगर में कचहरी है ,इसका शिलान्यास मेरी अध्यक्षता के दौरान ही हुआ था। हाईकोर्ट से प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस मेहरोत्रा के कर कमलों से सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन जनपद न्यायाधीश श्री यूके वर्मा जी ने मुझे मंच पर स्थान दिया और अपने उदगार प्रकट करने का भी अवसर दिया। वे मेरा सबसे संक्षिप्त भाषण था जिसके प्रत्येक वाक्य पर तालियां बजीं और मुख्य अतिथि का भाषण मेरे भाषण पर ही केंद्रित रहा था। मेरे दोनो कार्यकालों में हड़ताल बहुत हुई उस समय सीनियर्स का एक ऐसा ग्रुप बन गया था जो किसी न किसी बहाने काम न करने में रुचि रखते थे। मैं अक्सर असहमत होता था लेकिन लोकतंत्रिक स्वभाव के कारण विवश हो जाता था।1991 में विधायक चुने जाने के बाद वकालत छोड़ दी और 2002 में चुनाव हारने के बाद चाहकर भी वकालत करने का साहस नहीं बटोर पाया।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Close