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UP की महिला जज को बर्खास्तगी के 14 साल बाद मिला इंसाफ

UP की महिला जज को बर्खास्तगी के 14 साल बाद मिला इंसाफ

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राहत वाला नजरिया रखने से किसी जज की ईमानदारी व सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। इस तरह के न्यायिक नजरिये को कदाचार नहीं कहा जा सकता। चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने ये टिप्पणी उत्तर प्रदेश की एक अतिरिक्त जिला जज साधना चौधरी की बर्खास्तगी केआदेश को दरनिकार कर दिया है। पीठ ने उन्हें पुन:बहाल करने का आदेश दिया है। इस जज को बर्खास्ती के 14 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लडने के बाद न्याय मिला है।

वास्तव में साधना चौधरी पर आरोप था कि गाजियाबाद में अतिक्ति जिला जज पर रहने के दौरान भूमि अधिग्रहण के जुड़े दो मामलों में उन्होंने न्यायिक शिष्टाचार व मानक से इतर जाकर आदेश पारित किया था। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने न्यायिक शिष्टाचार व मानक के विपरीत जाकर मुआवजे देने का निर्णय लिया था।

इसके बाद उनके खिलाफ जांच कमेटी भी बैठी थी और आरोप को सही बताया गया था। इसे यूपी गवर्नमेंट सर्विस कंडक्ट रूल्स की धारा-तीन के तहत कदाचार माना गया। 17 जनवरी 2006 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी इसे चुनौती दी थी लेकिन वहां राहत नहीं मिली थी। जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस न्यायिक अधिकारी के दो आदेशों में से एक मामले में तो हाईकोर्ट ने मुआवजे की रकम भी बढ़ा दी है। लिहाजा  न्यायिक अधिकारी के खिलाफ यह मामला ताश के पत्ते की तरह ढह जाता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि महज संदेह के आधार पर कदाचार नहीं हो जाता। कदाचार साबित करने के लिए दस्तावेजीय प्रमाण भी होना चाहिए।

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