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निकाय चुनाव: विपक्षी दलों की साख दांव पर

 

देश और प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के हिंदुत्व कार्ड ने विपक्षी दलों के पुख्ता समझे जाने वाले वोट बैंक को निगल लिया है। भाजपा का हिंदुत्व कार्ड ऐसा ब्लैक होल बन गया है जिसमें सपा का यादव, बसपा का जाटव और रालोद के जाट वोटों का बड़ा हिस्सा इस ब्लैकह़ोल में समाता जा रहा है। कांग्रेस पहले ही अपना वोट बैंक मंडल कमंडल और बसपा के वर्चस्व के सामने गंवा चुकी है। जहाँ तक बात गाजियाबाद की है यहाँ निकायों से लेकर संसद तक भाजपा ही भाजपा है। फरीदनगर और डासना अल्पसंख्यक आबादी के वर्चस्व के कारण अपवाद हैं। इस बार लोनी सीट पर मनोज धामा के दम पर रालोद टक्कर में रह सकता है। मुरादनगर सीट पर भी बसपा यदि पूर्व विधायक वहाब चौधरी को मैदान में उतारती है तो यहाँ भी कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। नगर निगम में पार्षद और अन्य निकाय में सभासदों के चुनाव स्थानीय कारक बड़ी भूमिका निभाते हैं। कहीं कहीं कुछ स्थानों पर पार्टी की भूमिका भी काम कर जाती हे। गाजियाबाद में सपा, बसपा और रालोद तीनों की ही स्थिति एक जैसी है। सपा अपने संस्थापक मुलायमसिंह यादव के बिना पहला चुनाव लड़ने जा रही है। गाजियाबाद में सपा का कुनबा एकजुट नहीं हैं। मुलायम समर्थकों को पहले ही एक तरफ किया जा चुका है। सपा के पास महापौर और निकायों के लिये मजबूत उम्मीदवार भी नहीं हैं। बसपा की भी ऐसी ही हालत है। सीट सामान्य रहे या आरक्षित, इस सीट पर बसपा अच्छा संघर्ष करेगी। डासना और फरीदनगर में भी बसपा दलित मुस्लिम गठबंधन के दम पर संघर्ष कर सकती है। फिलहाल भाजपा का दबदबे के सामने विपक्षी दल बौने दिखाई दे रहे हैं। पूरी स्थिति आरक्षण होने के बाद स्पष्ट होगी कि विपक्षी दलों मे से कौन किस सीट पर मजबूती दिखा पाता है।

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