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नकली मिठाई और अधिकारियों की चुप्पी

दीपोत्सव यानि दीपावली, गोवर्धन और भैया दूज के बाद छठ मैया का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इन दिनों मिठाईयों की खूब बिक्री होती है, क्योंकि दीपावाली पर एक दूसरे को मिठाई भेजने का शगुन माना जाता है। इसके बाद गोवर्धन फिर भैया दूज और छठ पर्व पर भी मिठाई की कमी तक पड़ जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जितना दूध नही होता तो उससे ज्यादा दूध की मिठाईयां कहां से बनकर तैयार हो जाती है। यां यूं कहे कि आपकी और हमारी जिंदगी में रसायनयुक्त मिठाईयां जहर घोल रही हैं। चंद रुपयों के लालच में मुनाफाखोर मिलावटी मिठाइयां बेचकर इंसान की जान से तब खिलवाड़ कर रहें है जब उनको खुद पता है कि एक दिन इस दुनिया को छोड़कर जाना है और साथ कुछ नही जाएगा। अक्सर त्यौहार आने से चंद दिनों पहले हलवाईयों की दुकान पर मिठाईयां बननी शुरु हो जाती है। दिन रात तरह तरह की मिठाईयां बनाते हैं। हैरत की बात तो यह है कि जितना दूध हमारे राज्य में नही मिल सकता, उससे कई सौ गुना दूध वाली मिठाईयां बनकर तैयार रहती है। इससे जग जाहिर है कि हम कैमिकल के दूध से बनी मिठाईयां खा रहे हैं। दीपावली पर मिठाइयों की ज्यादा बिक्री को देखते हुए बाजारों में नकली मावे की खपत बढ़ जाती है! जिम्मेदार अधिकारी उदासीन बने रहते हैं और नकली मावे की मिठाइयां हमारी सेहत तो बिगाड़ती ही हैं साथ ही गंभीर बीमारियों को भी दावत देती हैं। इसलिए मेरा मानना है कि बैकरी पर बने ब्रांडेड बिस्कुट, ब्रांडेड चॉकलेट, पेठे की मिठाई, बेसन या बूंदी का लड्डू या फिर सोनपापडी और बतीसा का इस्तेमाल कर खुद व दूसरे की जान से खिलवाड करने से बचें।

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