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वीरांगना दुर्गा के अदम्य शौर्य से रूबरू हुए दर्शक

 

स्वतंत्रता के इतिहास में दर्ज होगा दुर्गा भाभी का बलिदान : सिन्हा

संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से थर्टीन स्कूल ऑफ टेलेंट डेवलपमेंट ने दी दुर्गा भाभी को श्रद्धांजलि
संवाददाता
गाजियाबाद। आजादी के अमृत महोत्सव की कड़ी में आयोजित नाटक “आजादी की दीवानी दुर्गा भाभी” के माध्यम से दर्शकों को स्वतंत्रता संग्राम में उनके शौर्य से रूबरू होने का अवसर मिला। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय एवं थर्टीन स्कूल ऑफ टेलेंट डेवलपमेंट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित नाटक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व राज्यसभा सदस्य रवींद्र किशोर सिन्हा ने कहा कि जिन बलिदानियों का शौर्य इतिहास में दर्ज होने से रह गया है, उसे सम्मान गौरवशाली परंपरा का हिस्सा बनाया जाएगा। श्री सिन्हा ने कहा कि नाटक में गांधी, भगत, आजाद, बटुकेश्वर दत्त सहित कई नायक अपनी भूमिका निभाते नजर आते हैं, लेकिन अच्छा यह होगा अन्य समकालीन नायकों के बलिदान को भी इस बानगी में शामिल किया जाए। प्रस्तुति की सराहना करते हुए उन्होंने इस नाटक के देश भर में मंचन की पुरजोर मांग की।
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में गाजियाबाद की भूमि विरांगनाओं की शौर्य स्थली मानी जाती है। इस रहस्य सहित इतिहास में दर्ज होने से रह गए कई अन्य तथ्यों को अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव रचित और निर्देशित नाटक हमारे सामने उजागर करता है। एबीईएस इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रेक्षागृह में रविवार को मंचित नाटक को देखने उमड़ा जनसमूह अतीत के उन पृष्ठों का साक्षी बना जो किन्हीं वजह से इतिहास में दर्ज होने से रह गए थे।
नाटक पूरे तौर पर दुर्गा भाभी पर ही केन्द्रित है। लगभग एक सदी पुराने इतिहास, घटनाक्रम, परिवेश, देशकाल और सामाजिक जीवन व स्थितियों को नब्बे मिनट की अवधि में समेट पाना जटिल कार्य था। जिसे अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव व उनकी टीम ने धरातल पर उतार कर अपनी क्षमताओं कि परिचय दिया। नाटक का निर्देशन इसलिए भी चुनौतिपूर्ण था क्योंकि घटनाक्रम के अनुसार क्रांतिकारियों व दुर्गा भाभी का लाहौर से कलकत्ता के बीच का सफर रेलगाड़ी में मंचित किया जाना था। इसके अलावा बम निर्माण व उसका परिक्षण, परीक्षण के दौरान उसका फट जाना, असेंबली में बम विस्फोट और अंग्रेज गवर्नर की कार पर हमला जैसे दृश्यों का मंचन निःसंदेह बड़ी चुनौती थी। ऐसे ही तमाम रोमांचकारी दृश्य इस नाटक को सफलता के शिखर तक ले जाने में सहायक बने।
दुर्गा की भूमिका में तनु पाल ने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी। दुर्गा भाभी के बाल्यकाल, यौवन व वृद्धावस्था की भूमिका निभाने का कार्य तीनों ही कलाकारों ने बखूबी निभाया। अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव के लिखे नाटक को मंचित करने में सहायक लेखक का दायित्व मनु वर्मा, शिवम सिंघल, अनिरुद्ध और शौर्य ने निभाया। रोजी श्रीवास्तव ने वस्त्र परिकल्पना, संकल्प श्रीवास्तव ने संगीत, राघव प्रकाश ने सेट व प्रकाश परिकल्पना, दिव्यांग श्रीवास्तव ने सेट व प्रकाश सहायक, साहेब श्रीवास्तव व प्रखर श्रीवास्तव ने कला निर्देशन, हरि सिंह खोलिया ने रूप सज्जा, प्रखर श्रीवास्तव ने समन्वयक, आदित श्रीवास्तव ने सह निर्देशक अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव ने परिकल्पना व निर्देशन का दायित्व बखूबी निभाया। नाटक के परिस्थितिजन्य गीत चेतन आनंद ने लिखे हैं। शोधपरक सामग्री व संसाधन जुटाने में जगदीश भट्ट, डॉ. माला कपूर, रोजी श्रीवास्तव, आलोक यात्री, डॉ. ईशा शर्मा, शिव वर्मा, नरसिंह अरोड़ा, कुलदीप, अदित श्रीवास्तव ने विशेष योगदान दिया। नाटक को सफलता के शिखर तक पहुंचाने में शिवम सिंघल, प्रमोद सिसोदिया, मंजु मन, राजीव वैद, विनय कुमार, श्रेयस अग्निहोत्री, ऋषभ सहगल, शौर्य केसरवानी, इमप्रीत सिंह सहित 50 अन्य कलाकारों की मेहनत भी परिलक्षित होती है। सुप्रसिद्ध लेखक व व्यंग्यकार सुभाष चंदर, संस्कृति मंत्रालय के अनु सचिव पपुंजय कुमार, श्रीमती संतोष ओबराय, सुरेंद्र सिंघल, वागीश शर्मा, श्रीमती मंगला वैद, पूजा ओबराय, रोजी, तेजस्विनी, शकील अहमद सैफ, तेजवीर सिंह, पराग कौशिक, डॉ. प्रीति कौशिक, संतोष यादव, अभिषेक कौशिक सहित बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे।

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