Breaking Newsउत्तर प्रदेशराष्ट्रीयहमारा गाजियाबाद

क्या अब जिले में मेडिकल स्टोर चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं

अगर है तो फिर बिना लाईसेंस कैसे चल रहे हैं मेडिकल स्टोर

गाजियाबाद। जी हां आप सुनकर हैरान होंगे की मेडिकल स्टोर चलाने के लिए अब लाइसेंस की जरूरत नहीं है, लेकिन यह कभी संभव हो ही नही सकता। क्योंकि बिना लाइसेंस के मेडिकल स्टोर चलाना अपराध की श्रेणी में आता है और जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है जिला गाजियाबाद में। क्योंकि यहां नियम और कानून को ताक पर रखकर फर्जी मेडिकल स्टोर अवैध कॉलोनियों में धड़ल्ले चल रहे हैं। यह मेडिकल ड्रग इंस्पेक्टर अनिरुद्ध कुमार की अनदेखी के करण धडल्ले से खुल रहे हैं। स्टोर संचालकों को कोई डर इसलिए नही है कि जिन अधिकारियों को कार्यवाही करनी है वह पैसे की चकाचौंध में आंखे बंद कर कानों में रुई डालकर आराम की नींद सो रहे है। शिकायत करना भी इस भ्रष्ट समाज में गुनाह है, क्योंकि संबंधित अधिकारी शिकायतकर्ता को ही गुनहगार समझते है। कारण स्पष्ट है कि शिकायत मिलने पर कार्यवाही की तो घूस मिलना बंद। पढ़े लिखे फार्मेसी की डिग्री या डिप्लोमा लेने वाले युवा खुद को ठगा समझते है, क्योंकि बिना डिग्री के ही जब स्टोर खुल रहे हो तो डिग्री की क्या जरूरत? आम जनता इतनी जानकर नही है कि उन्हें पता लग सके की कौन सा फर्जी मेडीकल स्टोर है और कौन सा लाईसेंस धारक है। मेडिकल स्टोर पर हमेशा स्टोर संचालक का ड्रग लाइसेंस सामने ही लगा होना चाहिए, यदि लाइसेंस नहीं है तो समझ जाना चाहिए की स्टोर फर्जी चल रहा है और औषधि निरीक्षक का संचालक को कोई डर नही है। ऐसे फर्जी स्टोर आम लोगो की जेब भी खूब काटते है, क्योंकि बिना बिल की लोकल दवाईया मरीजों को दी जाती है, मरीज को क्या पता कि कौन सी दवा लोकल कंपनी की है और कौन सी ब्रांडेड कंपनी की। सस्ते के चक्कर में मरीज समझता है कि उसे अच्छा डिस्काउंट मिल रहा है, जबकि उन्हें इस बात का पता ही नही होता की वह दवाईयां इतनी असरदार नही होती। ऐसे फर्जी स्टोर की वजह से पूर्व में कई अप्रिय घटनाएं घटित चुकी है। यह लोगों को डिप लगाने से भी पीछे नहीं हटते हैं। पैसा पाने की चाह में यह लोगो की जान के साथ खिलवाड़ करते है। इस सबके लिए संबंधित अधिकारी जिम्मेदार है, क्योंकि यदि वह ईमानदारी से अपनी ड्यूटी करते तो ऐसे फर्जी स्टोर खुलते ही नही। शिकायतों के बावजूद कार्यवाही ना होना अधिकारियों की लापरवाही दर्शाता है या फिर ड्रग इंस्पेक्टर अनिरुद्ध कुमार को अनहोनी का इंतजार है। ऐसा न हो कि औषधि निरीक्षक की लापरवाही के चलते फर्जी स्टोर की वजह से किसी की जान पर न बन आए और लोगो का आक्रोश अधिकारियों की गले के फांस बन जाए। आम आदमी को नजरंदाज करने वाले अधिकारी उस वक्त शासन के संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के आगे मूक दर्शक ही बने दिखेंगे।

Show More

Related Articles

Close