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तिरछी नजर

सुप्रीम जजों की पीड़ा

 

सुप्रीम कोर्ट के जज सार्वजनिक तौर पर जिस तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं उसे देखते हुए समझा जा सकता है कि बाहर से होने वाली आलोचना उन्हें अंदर तक परेशान कर रही हैं। हाल ही में देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमण ने अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए इस बात पर संतोष जताया कि भारत में सरकार अपने हर कार्य पर न्यायपालिका की मोहर लगवाना चाहती है जबकि विपक्ष चाहता है कि कोर्ट उसके एजेंडे के मुताबिक चले। जस्टिस रमना को यह बताना पड़ा कि न्यायपालिका न्यायपालिका केवल संविधान के प्रति जवाबदेह है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के ही न्यायधीश जेबी पारदीवाला ने अपने भाषण में काकी जजों को उनके फैसलों की कारण सार्वजनिक तौर पर आलोचना से देश में खतरनाक स्थिति बन रही है जिसमें जज फैसला देने से पहले सोचेंगे कि मीडिया क्या कहेगा और बड़े पदों से रिटायर्ड आईएएस आईपीएस और जज क्या कहेंगे। उन्होंने सोशल मीडिया पर होने वाली जजों की आलोचना को रोकने की सलाह भी सरकार को दी। जस्टिस पारदी वाला उन दो जजों में से हैं जिन्होंने पिछले दिनों भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की थी। इन टिप्पणियों के बाद से सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ विशाला अभियान चलाया गया। इससे पहले जकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया था उसका विरोध गैर भाजपाई खेमे द्वारा किया गया था। जजों द्वारा सार्वजनिक तौर पर कहीं गई इन बातों से जाहिर होता है कि बाहर से होने वाली आलोचना उन्हें अंदर तक परेशान कर रही है। यह स्थिति देश की न्याय व्यवस्था के लिए अत्यंत खतरनाक है। कोई भी फैसला देते समय जजों के ऊपर अब यह दबाव होगा कि उनके खिलाफ किस तरह की टिप्पणियां हो सकती है। इसके बावजूद देश में जो कुछ भी आज हो रहा है उसे लेकर यही कहा जा सकता है कि इसका उपाय संभवत यही है कि न्याय पालिका अपने आप को संवैधानिक कसौटी पर खरा बनाकर रखें।

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