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मेयर चुनाव करेगा दलित वोटों के बिखराव का फैसला

विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी बसपा में सुधार के संकेत नहीं

गाजियाबाद। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद से बहुजन समाज पार्टी लगा था दलित वोटों को खोती जा रही है। बसपा को सबसे बड़ा झटका हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के दौरान लगा जब उसके साथ मजबूती से पिछले दो दशक से जुड़ा रहा जाटव समाज भी उसका साथ छोड़ गया। जाटव समाज बसपा के साथ भविष्य में कितनी मजबूती से खड़ा रहेगा या वह टूटेगा इस बात का पता महापौर चुनाव के दौरान लगेगा।
नगर निगम और निकाय चुनाव में सभासद और पार्षदों केवल संबंधित क्षेत्र के आधार पर डाले जाते हैं वहां पार्टी से अधिक व्यक्तिगत संबंध काम करते हैं। दूसरी तरफ महापौर या चेयरमैन के चुनाव में पार्टी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इस वर्ष के अंत में होने जा रही निकाय चुनाव का डंका एक तरह से बच चुका है और सभी दल अपने अपने संसाधनों को तौलने में लगे हैं। दूसरी तरफ अपने कैडर वह को खोने वाली बहुजन समाज पार्टी में अभी तक निचले स्तर पर सुधार का कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहा है।
विधानसभा चुनाव के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने केवल इतना किया है कि उन्होंने अपने भाई और भतीजे को राजनीति में उतार दिया है। मायावती के भतीजे आकाश आनंद के चारों तरफ चापलूसों ने घेरा डालना शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर बहुजन समाज पार्टी अत्यंत कमजोर है। बसपा ने यह सोचने का प्रयास ही नहीं किया है कि जाटव समाज किस कारण बसपा से टूटा और उसे किस तरह पार्टी के साथ जोड़ा जा सकता है।
बसपा की हालत यह है कि विधानसभा चुनाव में गाजियाबाद की 5 विधानसभा सीटों में से 4 सीटों पर आयात किये गये प्रत्याशी मैदान में उतारे गये थे। केवल एक साहिबाबाद सीट पर पुराने कार्यकर्ता अजीत सिंह पाल को मैदान में उतारा गया था लेकिन वे खुद अत्यंत हल के उम्मीदवार साबित हुए। अजीत सिंह पाल से उम्मीद भी नहीं थी कि वे जीतने लायक वोट बटोर पाएंगे। चुनाव के बाद 4 सीटों पर जो उम्मीदवार उतारे गए थे उनमें से मोदीनगर सीट से लड़ने वाली पूनम गर्ग पुरानी कार्य करता है लेकिन वह भी बसपा में केवल चुनाव के दौरान नजर आती हैं। बाकी गाजियाबाद, लोनी और मुरादनगर सीट पर जिन प्रत्याशियों को बाहर से लाकर बसपा ने चुनाव लड़ा था वह सभासद जितनी वोट भी बटोरने में असफल रहे।
विधानसभा चुनाव के बाद निकाय चुनाव में भी बसपा अपने कैडरों की जाटव समाज को संभालने में नाकाम रही थी। उसके बाद भी अभी तक यह प्रयास नहीं किया गया है कि बसपा अपने कैडरों को किस तरह संभाल सकती है। आगामी निगम चुनाव के दौरान बसपा में किसी बड़े बदलाव की संभावना नजर नहीं आती। बसपा में जिस तरह के हालात इस समय हैं उन्हें देखते हुए अभी भी लग रहा है कि नगर निगम में महापौर,पालिका परिषद और पालिका पंचायतों में चेयरमैन के चुनाव के दौरान बसपा का जाटव वह एक बार फिर बिखरेगा।

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