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महापौर: क्या पस्त विपक्ष भेद सकेगा भाजपा का चक्रव्यूह?

गाजियाबाद। नगर निगम के गठन के बाद से निगम के पांच बोर्ड का कार्यकाल पूरा होने की तरफ अग्रसर है। पांच कार्यकाल में वर्तमान महापौर आशा शर्मा छठी महापौर हैं। नगर निगम के पांचो कार्यकाल में भाजपा हावी रही है और महापौर पद पर भाजपा का ही कब जा रहा है। इस वर्ष के अंत में होने जा रहे निगम चुनाव की स्थिति भी वर्तमान हालत को देखकर लग रही है कि इस बार भी पस्त विपक्ष भाजपा के चक्रव्यू को भेदने में सफल नहीं हो सकेगा।
गौरतलब है कि नगर निगम के गठन के बाद शुरुआती दो कार्यकाल में वर्तमान विधायक अतुल गर्ग के पिता स्वर्गीय दिनेश चंद गर्ग महापौर रहे थे। नगर निगम के पहले चुनाव में महापौर पद पर चुनाव लड़ रहे बसपा के तत्कालीन उम्मीदवार जलालुद्दीन सिद्दीकी ने दिनेश चन्द्र गर्ग को कड़ी टक्कर दी थी। इसके बाद दूसरे कार्यकाल में भाजपा के दिनेश चंद गर्ग बिना टक्कर के चुनाव जीत गए, तीसरे कार्यकाल के लिए दमयंती गोयल को भी बड़े आराम के साथ जीत मिल गई। नगर निगम के चौथे कार्यकाल के दौरान महापौर का पद पिछड़ी जाति के लिए आरक्षित हो गया और वरिष्ठ पत्रकार तेलूराम कांबोज भाजपा उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे जिन्हें सपा उम्मीदवार सुधन रावत ने कड़ी टक्कर दी और श्री काम्बोज दोबारा गिनती के बाद चुनाव जीत सके थे। श्री काम्बोज का कार्यकाल पूरा नहीं हो सका और उनका निधन हो गया। उपचुनाव में आशु वर्मा आसानी के साथ चुनाव जीत गए और यही स्थिति वर्तमान महापौर आशा शर्मा के साथ भी रही।
विधानसभा चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने के बाद इस समय भाजपा के हौसले सातवें आसमान पर हैं। इसी हालात में इस वर्ष के अंत में प्रदेश में निकाय चुनाव होने जा रहे हैं। गाजियाबाद की हालत यह है कि विपक्ष का कोई भी दल कांग्रेस, बसपा, सपा और रालोद भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। पूरी तरह पस्त गैर भाजपाई दलों की स्थिति यह है कि उनमें चुनाव लड़ने के उम्मीदवारों की भारी कमी नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव के दौरान भी यह कमी पूरी तरह दिखाई दी थी। पांच कार्यकाल के दौरान महापौर पद पर ही भाजपा का कब्जा नहीं रहा है बल्कि नगर निगम बोर्ड में भी भाजपा बहुमत में रही है।
सबसे बड़ा राजनीतिक परिदृश्य है कि किसी भी दल के पास इस समय आधार वोट बैंक नहीं है। बसपा, सपा और रालोद सभी का आधार वोट बैंक भाजपा ने हथिया लिया है। यही कारण है कि भाजपा के सामने कोई भी राजनीतिक दल अपना वजूद नहीं खड़ा कर पा रहा है। इस वर्ष के अंत में होने जा रहे निगम चुनाव के दौरान की नजर नहीं आता कि भाजपा के चक्रव्यूह को तोड़ने में पस्त पड़ा विपक्ष कामयाब नहीं हो पाएगा।

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