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वामपंथ: चुनाव लड़कर वाममोर्चे ने दर्ज कराई अपनी उपस्थिति राज्य में वैकल्पिक राजनीति को दिशा देने का किया कार्य

देहरादून। हालांकि 14 फरवरी022को राज्य में चुनाव लगभग शान्तिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गये हैं । इस चुनाव का स्पष्ट सन्देश था परिवर्तन, जो होता हुआ दिख रहा है। उत्तर प्रदेश जहाँ दो चरणों का चुनाव सम्पन्न हो चुका है ,किसान आन्दोलन तथा भाजपा के कुशासन के परिणामस्वरूप वहाँ भाजपा का सूपड़ा साफ होता दिख रहा है। आगे के पांच चरणों में भी ऐसा ही होने जा रहा है । भाजपा की फूटफरस्त, साम्प्रदायिक तथा अधिनायकवादी राजनीति के पतन की शुरुआत इन पांच राज्यों के चुनावों से हो चुकी है। 2014 से केन्द्र की भाजपा सरकार कारपोरेट घरानों की जेबी सरकार रही है ,जिसका नेतृत्व संघ परिवार कर रहा है। सत्ता के अहंकार के चलते मोदी ,योगी तथा अमितशाह की जोड़ी लगभग पूरी तरह नेपथ्य की ओर चल पड़ी है। 2014 के बाद जनता के साथ जो क्रूर मजाक हुआ उसका अन्तिम जबाब भाजपा तथा उसके सहयोगियों को 2024 के चुनाव में मिलना सुनिश्चित है, जब लोकसभा चुनाव में इनकी शर्मनाक हार होगी। हालांकि हमारे राज्य में भी अन्य राज्यों की भांति ही भाजपा ने इस चुनाव में खुलकर सत्ता का दुरपयोग किया है तथा पानी की तरह पैसे बहाये हैं, किन्तु यह पैसा भी भाजपा के काम नहीं आया। जहाँ -जहाँ वाममोर्चा लडा़ वहाँ -वहाँ भाजपा के साथ ही कांग्रेस तथा उनके कार्यकर्ताओं का रुख वाममोर्चे एवं उनके प्रत्याशियों के प्रति जिम्मेदारी भरा नहीं रहा। कहने का अर्थ है कि हमारी पार्टी का चुनाव लड़ना उन्हें काफी अखरा जबकि वाममोर्चा खासकर सीपीएम हर समय वहाँ की जनता के साथ रही है। यह भी गौर करने के लायक है कि सीमित साधनों व भाजपा, कांग्रेस तथा आप पार्टी द्वारा धनबल के इस्तेमाल के बावजूद वाममोर्चे के प्रत्याशियों द्वारा इन दलों को कड़ी चुनौती दी गई है। नतीजे ई वी एम में बन्द हैं। 10 मार्च को पता चलेगा ऊंट किस करवट बैठेगा। वामपंथी दलों ने पूरे राज्य में जहाँ भी चुनाव लडा़, एक स्पष्ट सन्देश दिया है कि राज्य की जनपक्षीय राजनीति के लिए वामपंथी गठबंधन ही सही मायनों में अन्तिम विकल्प है ,यही इस विधान सभा चुनाव का सन्देश भी रहा है।

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