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जिले में शून्य के कगार की तरफ अग्रसर है बसपा

कैडर वोट को एकजुट नहीं कर पा रहे हैं प्रत्याशी

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गाजियाबाद। बहुजन समाज पार्टी के कैडर वोट को एकजुट करने में पार्टी प्रत्याशी सफल नहीं हो पा रहे हैं जिस कारण जिले में बहुजन समाज पार्टी शून्य के कगार की तरफ अग्रसर हो रही है।
गौरतलब है कि वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने लोनी, गाजियाबाद, साहिबाबाद और मुरादनगर की सीटों पर कब्जा किया था, केवल मोदीनगर सीट पर रालोद के सुदेश शर्मा जीतने में सफल रहे थे। वर्ष 2017 में सभी सीटों पर भाजपा लहर में भाजपा प्रत्याशी जीतने में सफल रहे लेकिन फिर भी बसपा का वोट प्रतिशत 20 से ऊपर रहा। पहला मौका है कि बसपा का वोट प्रतिशत गिरने का खतरा लगातार बना हुआ है। इसका बड़ा कारण बसपा के कैडर वोट में भी खराब होने के चलते पैदा हो रहा है।
पूर्व विधायक जिनका आज ही निधन हो गया है उनकी बीमारी के चलते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि के भाजपा के वरिष्ठ नेता केके शुक्ला को बसपा ने यहां गाजियाबाद सीट पर प्रत्याशी बनाया है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने यहां पहली बार अनारक्षित सीट पर जाटव समाज के एडवोकेट विशाल वर्मा को चुनाव में उतारकर बसपा को भारी झटका दिया है। इस सीट पर बसपा का कैडर जाटव समाज बड़ी संख्या में विशाल वर्मा की तरफ झुक रहा है जो के के शुक्ला के लिए नुकसानदेह होगा।
मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र से बसपा ने अयूब इदरीसी और लोनी विधानसभा क्षेत्र से आकिब को मैदान में उतारा है। दोनों ही प्रत्याशी न केवल राजनीति में नहीं बल्कि क्षेत्र में भी उनकी पहचान लगभग नहीं है। मुरादनगर प्रत्याशी अयूब इदरीसी की हालत यह है कि प्रत्याशी घोषित होने से पूर्व पार्टी के कार्यकर्ता भी उन्हें नहीं जानते थे। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में अभी तक वे पहुंचने में असफल रहे हैं। मुस्लिम प्रत्याशी होने के बावजूद वे मुस्लिम समाज को जोड़ने में भी सफल नहीं हो पा रहे हैं। यही स्थिति बसपा के लोनी प्रत्याशी की भी है।
साहिबाबाद जैसी सीट पर बसपा ने अपने पुराने कार्यकर्ता अजीत कुमार पाल को मैदान में उतारा है। अजीत कुमार पाल पार्टी के प्रति समर्पित है लेकिन वे चुनावी हवा बनाने में अभी तक कामयाब नहीं हो सके हैं। मोदीनगर प्रत्याशी डॉक्टर पूनम गर्ग लंबे समय से बसपा में हैं लेकिन सपा रालोद गठबंधन के प्रत्याशी सुदेश शर्मा और भाजपा प्रत्याशी वर्तमान विधायक डॉ मंजू शिवाच के सामने काफी कमजोर साबित हो रही है।
ऐसी स्थिति में अभी तक की हालत यह है कि किसी भी सीट पर बसपा यह नहीं कह सकती कि वहां जीत की हालत है। 3 फरवरी को बसपा प्रमुख गाजियाबाद आ रही है जिसके बाद चुनावी माहौल बदलने के आसार हैं। 3 फरवरी के बाद जो प्रत्याशी चुनावी गणित के हिसाब से खुद को बदलेगा वही मैदान में जीत की दौड़ में शामिल होगा अन्यथा बसपा की हालत इस बार पतली है।

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