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मायावती की चुप्पी से हो सकता है दलित वोटों में बिखराव

बसपा के आधार वोट बैंक जाटव समाज में बढ़ रहा है बसपा का विरोध

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गाजियाबाद । विधानसभा चुनाव की गतिविधियां तेजी के साथ आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद बसपा प्रमुख मायावती की चुप्पी दलित वोटों में बिखराव का कारण बनने जा रही है।
वर्ष 1993 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच विधानसभा चुनाव के लिए हुआ गठबंधन उत्तर प्रदेश में दलित वोटों को लेकर बड़े बदलाव का कारण बना था। इसमें दूसरा बड़ा मोड़ तब आया जब जून 1995 में गेस्ट हाउस कांड हुआ जिसके बाद दलितों की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी संख्या वाली जाटव जाति बसपा के साथ पूरी तरह गोलबंद हो गई जो हाल तक बसपा के साथ बनी रही है। प्रदेश में जाटव जाति के मतदाताओं की संख्या लगभग 17 फ़ीसदी है जो बसपा का बड़ा आधार रहा है। बसपा के इस आधार में सेंध भीम आर्मी के संस्थापक एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद ने लगाई। एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद के उभार के साथ ही बसपा के आधार वोट बैंक जाटव में बिखराव शुरू हो गया था। बसपा के इस आधार वोट बैंक में इस समय और बड़ा बिखराव होता नजर आ रहा है।
एडवोकेट चंद्रशेखर आजाद वर्तमान विधानसभा चुनाव में अभी क्या करेंगे यह स्पष्ट नहीं है लेकिन यह स्पष्ट होता नजर आ रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ खड़ा रहा जाटव मतदाता भाजपा को हराने के लिए सपा रालोद गठबंधन के साथ जा सकता है। गाजियाबाद में सपा रालोद गठबंधन ने जाटव समाज के एडवोकेट विशाल वर्मा को उतारकर बड़ा खेल खेला है। यहां वैश्य समाज के सुरेश बंसल 2012 में विधायक बने थे जो 2017 में भी उम्मीदवार रहे और भाजपा प्रत्याशी अतुल गर्ग से चुनाव हार गए थे। अब एक बार फिर सुरेश बंसल ही बसपा प्रत्याशी थे जो कोरोना पॉजिटिव होने के कारण चुनाव मैदान से हट गए हैं। चर्चा है कि यहां संघ पृष्ठभूमि के एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मैदान में उतारा जा रहा है। बसपा पदाधिकारियों से लेकर आम जाटव मतदाताओं में इस बात का विरोध है।
आम जाटव मतदाताओं का झुकाव सपा रालोद प्रत्याशी विशाल वर्मा की तरफ होता नजर आ रहा है। विशाल वर्मा के पक्ष में बड़ी बात उनका पूर्व विधायक योगेश वर्मा का भतीजा होना है। योगेश वर्मा उस समय जेल गए थे जब दलित उत्पीड़न अधिनियम में बदलाव किए जाने के बाद जाटव समाज के लोगों ने 2 अप्रैल से आंदोलन शुरू किया था जिसमें पुलिस के गोली से एक दर्जन से अधिक जाटव युवा मौत की नींद सो गए थे। उस समय जेल जाने के कारण योगेश वर्मा का कद जाटव समाज में एकाएक बढ़ गया था। इन सब बातों के बावजूद जाटव समाज बसपा के साथ एकजुट था लेकिन अब इस चुनाव में मायावती की चुप्पी बसपा के इस आधार वोट बैंक को भ्रमित कर रही है।
इसके अलावा जिस तरह बसपा से पुराने कार्यकर्ताओं को निष्कासित किया जा रहा है वह भी जाटव मतदाताओं में बिखराव का कारण बन सकता है। फिलहाल जाट मतदाता मायावती की तरफ देख रहे हैं कि चुनाव में उनका रुख क्या होता है। आज ऐसी ही हालत रही तो जाटव मतदाताओं में बिखराव तय है जो बसपा के भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है।

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