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लड़की हूं लड़ सकती हूं के नारे ने प्रियंका ने मचाई सियासी हलचल

महिला शक्ति पर दांव लगाकर उठाया बड़ा राजनीतिक कदम, परिणाम कुछ भी रहे, चर्चाओं में आई कांग्रेस

चुनाव आते जाते रहेंगे। कांग्रेस हारती जीतती रहेगी, प्रियंका गांधी भी सफल या असफल होती रहेंगी। सियासी तालाब में तैरने वाला कौन ऐसा होता है जो नहीं जानता कि वह कितने पानी में है। प्रियंका गांधी भी क्या नहीं जानती होंगी कि कांग्रेस की हालत उत्तर प्रदेश में कैसी है लेकिन अगर फिर भी उन्होंने साहस दिखाकर लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देकर सियासत के कंगूरों को जिस तरह हिलाया है उसने कांग्रेश पर जमी बर्फ को पिघलाना शुरू कर दिया है। इस बात को प्रियंका गांधी भी जानती होंगी की कांग्रेश राज्य की सत्ता में आने नहीं जा रही है लेकिन उनके सरोकार और परिश्रम ने कांग्रेस को अनाम खूंटी से उतारकर राजनीतिक चौपाल के जाजम पर बिठा दिया है।
प्रियंका गांधी ने पहले चरण में जो 125 प्रत्याशियों की सूची जारी की है उसमें 50 महिलाओं को टिकट देकर उन्होंने निश्चित तौर पर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचाई है। खुले दिल से स्वीकार किया जाए तो प्रियंका ने महिलाओं को अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक की तरह स्थापित कर दिया है। प्रियंका गांधी के इस कदम से जाति बिरादरी, समुदाय और धर्म के भरोसे चुनाव की सामाजिक यंत्र कारी करने वाले राजनीतिक दल हकबका गए हैं। प्रियंका गांधी ने उन्नाव की रेप पीड़िता की मां को उम्मीदवार बनाने के साथ-साथ ऐसी महिलाओं को उम्मीदवार बनाया है जो अपने दम पर अपना भविष्य लिखने की इच्छा रखती है। राजनीति का नया व्याकरण रचने के लिए जो यज्ञ प्रियंका कर रही है उसको बजने वाली ऊष्मा का अभिनंदन किया जाना चाहिए। चुनावी अंक गणित के क्षुद्र उठापटक के उपक्रम होते रहेंगे लेकिन सियासत के धरने में बुनियादी बदलाव लाने के काम कभी-कभी होते हैं और महिलाओं को इस तरह सामने लाकर खड़ा करने का काम प्रियंका गांधी ने किया है। आम स्त्रियों के मनोबल को कुवे की तलहटी से खींच कर राजनीति के तोरण का ताज बनाना मामूली पहल कदमी नहीं है।
पिछले दो दशक में उत्तर प्रदेश की विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा 583 महिला प्रत्याशी वर्ष 2012 के चुनाव में लड़ी थी। 2007 के चुनाव में 370 महिला उम्मीदवार मैदान में थी जबकि 2002 में इनकी संख्या 344 थी। 5 वर्ष पूर्व 2017 में 482 महिला प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा था। इस बार फरवरी-मार्च में हो रहे चुनाव में अब तक लगभग 160 महिला उम्मीदवार तो अकेले कांग्रेसी घोषित कर चुकी है। स्त्रियों के राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए प्रियंका की छलांग हल्के में लेने वाले हो सकता है कि अपना माथा पीट ले। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेश ने उत्तर प्रदेश में लगभग चंबल लाख मतदाताओं का मत प्राप्त किया था। महिलाओं को टिकट देकर प्रियंका गांधी ने प्रदेश के 15 करोड़ मतदाताओं में से सात करोड़ महिलाओं को आकर्षित करने का प्रयास किया है। गौरतलब है कि नए जुड़े 5200000 मतदाताओं में से पौने 29 लाख महिलाएं हैं। साढे चौदह लाख मतदाता इस चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त इन मतदाताओं में से यदि आधे भी भाजपा के खिलाफ चले गए तो इस बार का चुनाव योगी के मठ और नरेंद्र मोदी के हठ पूरी तरह ले बैठेगा। 2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 54 लाख मत मिले थे। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि कांग्रेस को मिलने वाले मतों की संख्या इस बार 90 लाख तक भी पहुंच गई तो उसकी सीटों की तादाद 40 को छू जाएगी।
लड़की हूं लड़ सकती कि मारक क्षमता के देशव्यापी फलक पर जरा नजर डालिए। भारत की आबादी में लगभग 48 फ़ीसदी महिलाएं हैं। पिछले डेढ़ दशक में महिलाओं की आबादी थोड़ा बढ़नी शुरू हुई है वरना उससे पहले गिरती ही रही है। 67 करोड़ महिलाएं हैं जिनमें से 18 से 19 साल के बीच की युवतियों की तादाद डेढ़ करोड़ है। 20 से 24 वर्ष के बीच पौने छह करोड़, 25 से 29 साल के बीच साढ़े पांच करोड़, 30 से 34 साल के बीच 5 करोड से अधिक, 35 से 45 वर्ष के बीच नौ करोड़ मतदाता है। 60 वर्ष से ज्यादा उम्र की महिलाओं के आंकड़े को छोड़ भी दिया जाए तो 15 से 59 साल की उम्र की 38 करोड़ स्त्रियां इस समय देश में है। अभी तक मीडिया में केवल सपा रालोद गठबंधन और भाजपा को ही लेकर चर्चा हो रही है जबकि कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को मीडिया ने बिल्कुल उपेक्षित कर रखा है।
प्रियंका गांधी ने जिन महिलाओं को टिकट दिया है उनमें बहुचर्चित उन्नाव रेप पीड़िता की मां, कभी सपा की प्रवक्ता रही तेजतर्रार महिला नेता पंखुड़ी पाठक और मेरठ में जन्मी जाटव समाज की सामाजिक कार्यकर्ता व अभिनेत्री अर्चना गौतम भी शामिल हैं। अर्चना गौतम को जाटव समाज के दिग्गज नेता योगेश वर्मा के सामने हस्तिनापुर में उतारा गया है तो पंखुड़ी पाठक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र का मुकाबला करेंगी। उन्नाव रेप पीड़िता की मां को टिकट देकर प्रियंका गांधी ने ऐसा दांव चला है कि अखिलेश यादव भी मजबूर होकर कह उठे हैं कि उनके सामने गठबंधन का प्रत्याशी नहीं होगा। सियासी शतरंज की चौसर बिछ चुकी है और सभी दलों ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी हैं देखना होगा कि प्रदेश की सियासी शतरंज का ऊंट किस करवट बैठेगा।

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