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चुनाव आयोग की अदूरदर्शिता या सोचा समझा कदम!

पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव आयोग ने तिथियां तय की है उन्हें लेकर सवाल उठने लगे हैं। दिसंबर और जनवरी माह में हिंदुओं के विवाह नहीं हुए। हिंदू पंचांग के अनुसार इन 2 महीनों में विवाह की तिथियां नहीं थी। फरवरी माह की 10 तारीख को विवाह की पहली तिथि है और इस तिथि को बड़े पैमाने पर विवाह हो रहे हैं। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में पहले चरण का चुनाव 10 फरवरी को ही तय किया है। मतदान के कारण जिनके घरों में विवाह है उन्हें वाहन नहीं मिल पा रहे हैं। इसके अलावा मतदान होने कारण उस दिन सुरक्षा व्यवस्था भी खड़ी रहेगी। इन बातों को देखते हुए अनेक लोगों ने विवाह की तिथि आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है। आम लोगों का कहना है कि चुनाव आयोग को इन सभी बातों पर दृष्टिपात करते हुए अपना कार्यक्रम तय करना चाहिए। चुनाव आयोग द्वारा मणिपुर में चुनाव के लिए मतदान की पहली तिथि जो तय की है उस दिन रविवार है। रविवार होने के कारण मणिपुर में चुनाव आयोग का बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है। मणिपुर की 70 फ़ीसदी आबादी ईसाई समुदाय की है और रविवार को ईसाई समुदाय के लोग गिरिजा घरों में जाकर विशेष तौर पर पूजा करते हैं। इस बात को लेकर मणिपुर में चुनाव आयोग का विरोध हो रहा है और मांग की जा रही है कि चुनाव की तिथि बदली जाए। चुनाव आयोग यदि तिथि नहीं बदलता है तो मणिपुर में मतदान बुरी तरह प्रभावित होगा। ईसाई समुदाय के लोगों का मतदान प्रभावित होगा। दूसरी तरफ ईसाई समुदाय के मत अधिक पड़ेंगे। सवाल इसी बिंदु पर उठ रहा है कि क्या यह कदम जानबूझकर उठाया गया है। मणिपुर में बड़े पैमाने पर मांग की जा रही है कि चुनाव आयोग मतदान की तिथियों में फेरबदल करें। पश्चिम बंगाल में भी जिस तरह मतदान के लिए आठ चरण तय किए गए थे उसे लेकर भी वहां काफी विरोध हुआ था। वर्तमान चुनाव आयोग को लेकर उठ रहे सवालों का सीधा संबंध आम जनता से है इसलिए यह आवश्यक है कि मतदान की तिथियों में फेरबदल किया जाए। ऐसा संभव नहीं हो पाता है तो भविष्य के लिए इस बात को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मतदान की जो तिथियां तय की जा रही हैं वह आम आदमी के किसी तरह आडे तो नहीं आ रही हैं। मतदान के जरिए आम आदमी ही अपना मत डाल कर सरकार के चुनाव में सहभागी बनता है। आम आदमी के इस पुनीत कार्य के कारण यदि उसके रोजमर्रा के कार्य में बड़ा व्यवधान आता है तो उसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। यह सच है कि मतदान किसी भी दिन हो कुछ परेशानी तो लोगों को उठानी ही पड़ती। चुनाव आयोग के पास बड़ी टीम है जो यह बताने में सक्षम है कि जो तारीख है आयोग तय कर रहा है,उस दिन किसी तरह का कोई ऐसा आयोजन तो नहीं है जो आम आदमी के लिए परेशानी का कारण बने। अब संवैधानिक पद पर बैठे चुनाव आयोग के हाथ में है कि वह तिथियों में किसी तरह का परिवर्तन करता है या नहीं।

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