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कितने जिम्मेदार हैं हमारे सांसद?

किसी भी लोकसभा क्षेत्र की जनता संसद में अपने जनप्रतिनिधि का चुनाव अनेक उम्मीदों के साथ करती है। जनता को उम्मीद होती है कि उसका जनप्रतिनिधि संसद में पहुंचकर उसके हितों की आवाज उठाएगा। इसके बावजूद हमारे जनप्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा पा रहे हैं। इसका ज्वलंत उदाहरण पिछले सप्ताह उस समय मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के सांसदों को सदन में उनकी गैर हाजिरी पर काफी खरी-खरी सुनाई थी। प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि यदि आप सदन में हाजिर रहने से कराएंगे तो यह भी हो सकता है कि जनता आपका इसमें आना ही बंद कर दे। इसके बावजूद हालात सुधर ते दिखाई नहीं दे रहे हैं। सदन 11:00 बजे शुरू होता है और सदन में कल जब शुरुआत हुई तो वहां भाजपा के केवल 58 सदस्य पूर्व मंत्री मौजूद थे जबकि भाजपा के सदस्यों की संख्या 301 पूर्व मंत्रियों की संख्या 78 है। 543 सदस्यों वाली लोकसभा में दोपहर तक भाजपा के 83 और विपक्ष के 81 सदस्य थे। यह हाल उस सदन का है जो संप्रभु कहा जाता है यानी उसे सर्वशक्तिमान माना जाता है। उसकी शक्ति इतनी ज्यादा है कि वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या सर्वोच्च न्यायाधीश को अपनी ताकत के बल पर हटा सकते हैं। कोई भी कानून उसकी सहमति के बिना बन नहीं सकता लेकिन कानून बनाने वाले जनता के प्रतिनिधि ही पूर्ण तरह जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि संसद की लगाम नौकरशाहों के हाथों में चली जाती है क्योंकि मंत्रियों सांसदों से भी अधिक वोट और नोट के धंधे में फंसे रहते हैं। इस कारण कई उल्टे सीधे कानून बन जाते हैं जिन्हें बाद में सरकार द्वारा वापस लिया जाता है या उनमें संशोधन किया जाता है। लोकसभा को निम्न राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है लेकिन दोनों ही सदनों में सांसदों का आचरण उनके ऊपर अनेक तरह के आक्षेप खड़े कर रहा है। दोनों सदन यदि अपने काम ठीक से करें तो भारतीय लोकतंत्र स्वस्थ और सफल बना रहेगा। संसद को लोकतंत्र का ह्रदय माना जाता है। लेकिन हमारी संसद की हृदय गति कैसी है इसे आज आम जनता भी देख रही है जिस में सुधार की आवश्यकता है। जरूरत है सांसदों के जिम्मेदार बनने की ताकि संसद अपना काम ठीक ढंग से करें ताकि देश की आम जनता के हित में आवश्यक कदम उठाए जा सकें।

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