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राजनीति का अखाड़ा बनने लगा है श्मशान घाट पीड़ितों का धरना

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गाजियाबाद। इस वर्ष की शुरुआत में ही 3 जनवरी को मुरादनगर में ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ था जो कई परिवारों को जिंदगी भर का दर्द देकर चला गया। मुरादनगर के उखलारसी गांव में स्थित श्मशान घाट में एक बुजुर्ग के दाह संस्कार के दौरान नवनिर्मित बरांडे की छत गिरने से 25 लोगों की मृत्यु हो गई थी।
25 लोगों की मृत्यु ने न केवल मुरादनगर बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों को दहला दिया था। उस समय शासन ने श्मशान घाट पीड़ितों को आर्थिक मुआवजा, पीड़ित परिवार के एक सदस्य को नौकरी और जिनके पास आवास नहीं था उन्हें आवास देने की घोषणा की गई थी। शासन की तरफ से पीड़ित परिवारों को 1200000 रुपए का आर्थिक मुआवजा दिया गया। इसके अलावा बाकी कोई सहायता नहीं दी गई। पीड़ित परिवार लगातार अपनी गुहार प्रशासन से लेकर शासन पर लगाते रहे हैं। अब उन्होंने 2 दिसंबर से मुराद नगर पालिका कार्यालय में धरना शुरू कर दिया है।
पीड़ित परिवारों का धरना ऐसे समय हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में शीघ्र ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में उन लोगों को धरना प्रदर्शन ने आकर्षित करना शुरू कर दिया है जो विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं। श्मशान घाट पीड़ितों के धरने में कल कई नेताओं ने पहुंच कर धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों को अपना समर्थन व्यक्त किया। श्मशान घाट पीड़ितों के धरना स्थल पर पहुंचने वाले यह वह लोग हैं जिन्होंने 3 जनवरी 2021 को हुए हादसे के बाद से पीड़ितों के आंसू पोंछने का कोई काम नहीं किया है। पिछले 1 साल से श्मशान घाट पीड़ित शासन और प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाते रहे हैं लेकिन किसी भी दल के किसी नेता ने उनकी सहायता करने का कोई प्रयास नहीं किया है। अब जबकि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं तब पीड़ितों की सहानुभूति बटोरने के लिए नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी शुरू कर दी है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि नगर पालिका के चेयरमैन ने हादसे के बाद भी काफी दिनों बाद पीड़ित परिवारों की सुध ली थी और अब भी वह मुरादनगर नहीं पहुंचे हैं। चेयरमैन के न पहुंचने की चर्चा धरना पीड़ितों के अलावा आम लोग भी करने लगे हैं। सत्तारूढ़ दल के किसी भी छोटे या बड़े नेता ने श्मशान घाट पीड़ितों की बात सुनने की कोशिश ही नहीं की है। लोगों का कहना है कि एक साथ हुई 25 मौतों ने भी प्रदेश सरकार की संवेदनाओं को नहीं झकझोरा। आज भी यह लोग अपनी आवाज शासन तक पहुंचाने के लिए अपने मासूम बच्चों के साथ धरना दे रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विधानसभा चुनाव की बेला में इन लोगों की आवाज सुनी जाएगी या नहीं।

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