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इस समय के महान समाज सुधारक व महापुरुष बाबा उमाकान्त जी ने बताये खान-पान, आचार-विचार, नियम-संयम के स्वर्णिम सूत्र

कम खाओ, गम खाओ यानी बर्दाश्त करो तो बहुत बीमारियों, झगड़ा-झंझट से बच जाओगे

व्यक्तिगत ही नहीं अपितु परिवार, समाज, देश, विश्व स्तर की समस्या, परेशानीयों को दूर करने के उपाय बता कर मनुष्य की आध्यात्मिक तरक्की का मार्ग दर्शन करने वाले इस समय के त्रिकालदर्शी समर्थ सन्त सतगुरु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 24 नवंबर 2021 को जालंधर में दिए व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर प्रसारित संदेश में बताया कि प्रेमियों! रोटी खिलाना, पानी पिलाना, गरीबों की मदद कर देना यह सब पुण्य स्त्रोत बनता था। उसको भी लोगों ने छोड़ दिया। अब तो बस जितना मिल जाए सब रख ले, कितना मिल जाए, कहां से हड़प करके ले आओ, कितना लूट ले आओ, यह भावना लोगों के अंदर में हो गई है।

जब आपको अनुभव हो जाएगा तो बात पर विश्वास हो जायेगा

ऐसे समय पर परेशानी, खाने-पीने की, रहने की तो रहेगी। ऐसी परिस्थितियों में आदमी को विश्वास नहीं हो पाता लेकिन जब कोई बात अनुभव में आ जाती है तब विश्वास हो जाता है। भाई बीमारी से बचना है तो एक रोटी का भूख रखकर के खाओ तो आराम से हजम हो जाएगा। आदमी के शरीर का सिस्टम ऐसा है कि पेट, सीने सबका संबंध दोनों आंखों के बीच में है। पैर के अंगूठे में अगर कांटा चुभा तो दोनों आंखों के बीच में अनुभव होता है। सब अंग जीवात्मा से जुड़े हुए हैं और जीवात्मा परमात्मा की अंश है। उसके अंदर ज्ञान, ताकत है इसलिए आदमी को ज्ञान तो हो जाता है कि यह चीज हमको नुकसान करेगी। लेकिन वही चीज अगर खाते चले गए तो तकलीफ-रोग तो होना ही होना है। वचनों को जब याद रखा जाता है, सूत्र को पकड़ लिया जाता है तो परेशानी हट जाती है। वचन भूलने पर मन के कहने से खाते-दबाते चले जाते हैं तो नियम का पालन नहीं हो पाता है।

जैसे धरती का नियम अलग है वैसे ही सतलोक का नियम अलग है

जैसे अलग-अलग राज्य सरकारों के, केंद्र के नियम अलग होते हैं ऐसे ही सचखंड सतलोक वासियों के और ये निचले देवी-देवताओं के, ब्रह्मा-विष्णु-महेश के नियम अलग होते हैं।

कम खाओगे तो बीमारी और बर्दाश्त कर लोगे तो झगड़ा-झंझट से बचे रहोगे

कम खाओ और गम खाओ तो झगड़ा झंझट से बचे रहोगे। झगड़ा-झंझट में अगर फंस जाओगे तो निकल पाना बड़ा मुश्किल होगा। झगड़ा झंझट क्या होता है? एक तो मारपीट का होता है, एक गाली-गलौज का, एक पुत्र, परिवार, समाज, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, प्रांतवाद, भाषावाद का होता है। इसीलिए कहा जाता है कि इन चीजों से दूर रहो, अपने काम से काम रखो। जो इंसानियत-मानवता का काम है, उसको करो। अगर इसमें फ़सोगे तो मानवता-इंसानियत खत्म होगी, आपकी अच्छी आदतें धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगी, इसी में नाम कमाने के लिए मन आपके शरीर को प्रेरित कर देगा कि ऊंची जगह मिल जाएगी, मान-सम्मान मिल जाएगा, बस उसी में फंसते चले जाओगे।

अभी चैलेंज करोगे तो बता दूंगा 10-20-50 को कि इनके घर में कोई न कोई बीमार ही रहता है

आजकल घर-घर बीमारियां और लड़ाई-झगड़ा का कारण है कि कम नहीं खाते हैं और गम नहीं खाते। चैलेंज करोगे तो अभी बता दूंगा, 10-20-50 को बता दूंगा कि इनके घर में झगड़ा, बीमारी बनी ही रहती है, कोई नियम नहीं है।

आदमी से ज्यादा जानवर करते हैं संयम-नियम का पालन

जानवर नियम का पालन करता है आदमी नहीं करता। खा-पीकर के आया, कोई सामने रख दो रसगुल्ला, कह दो खा लीजिए तो बोलेगा खाकर के आया हूँ। लेकिन एक उठा के खा लेगा। आप देखो न उसकी तरफ तो दूसरा-तीसरा, पूरी प्लेट खा लेगा। लेकिन देखो कुत्ता खा-पीकर के आया है, उसके सामनेप बढ़िया से बढ़िया चीज डाल दो तो सूंघ करके छोड़ देगा। आवारा कुत्ता जिसको खाना मिलने का ठिकाना नहीं, वो उठाकर के ले जाएगा और छिपा करके कहीं रख देगा लेकिन जब भूख लगेगी तभी खाएगा।

12 महीने में केवल क्वार महीना में कुत्ता पगलाता है और आदमी को देखो हमेशा पागलपन सवार हैं, नियम-संयम से रहो

अब आप सोचो कौन नियम का पालन करता है? 12 महीने में क्वार के महीने में पगलाता है लेकिन आदमी पर हमेशा पागलपन सवार है। इसलिए आप भी संयम का पालन करो, संयमित जीवन बिताओ।

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