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किसान आंदोलन खत्म हो तो कैसे?

किसान आंदोलन महज एक झांकी है। यह किस बात की झांकी है कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों में जो नीतियां बदहाली पैदा कर रही है उससे इस तरह के और भी जन आंदोलन खड़े हो सकते हैं। इस रूप में जो स्थितियां पैदा हो रही है जिनसे एक तबका लगातार अमीर हो रहा है और बाकी जनता लगातार दिक्कतें झेल रही हैं। तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद जिस तरह विपक्षी दलों में जीत का माहौल दिखाई दिया वैसा आंदोलनकारी किसानों और उनके संगठनों में दिखाई नहीं दे रहा है। सरकार और उनके समर्थकों को आशा थी कि प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद उन्हें धन्यवाद देते हुए किसान घर वापस चले जाएंगे। ऐसा नहीं हो पाया और किसान आज आंदोलन स्थल पर डेरा डाले हुए हैं। इसी के साथ भाजपा व आर एस एस के सिस्टम से जुड़े समूहों ने फिर से आंदोलनकारी किसानों को लांछित करने का अभियान छेड़ दिया है। कहा जाने लगा है कि आंदोलन कर रहे संगठन किसान हित में नहीं राजनीतिक मकसद से आंदोलन पर उतरे हैं। दरअसल सारे मुद्दे को समझने के लिए हमें एक ठोस संदर्भ पर गौर करना होगा। आंदोलनकारी संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में अपनी 6 मांगे सामने रखी है। इनमें तीन मांगे अपेक्षाकृत पुरानी है जबकि तीन मांगे आंदोलन के दौरान पैदा हुए हालात से उभरी है। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य अर्थात एम एस पी की गारंटी के लिए कानून बनाना, बिजली विभाग की वापसी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने वाले प्रदूषण के लिए पराली जलाने वाले किसानों को दंडित करने के प्रावधान खत्म करने की मांग पहले से ही थी। इनमें से पराली वाली मांग को मानते हुए सरकार ने घोषणा कर दी है कि इसमें अपराध नहीं माना जाएगा। तीन मांगे बाद में पैदा हुई है जो आंदोलन के दौरान मरे किसानों के परिजनों को मुआवजा, आंदोलनकारी किसानों पर दायर मुकदमों की वापसी और लखीमपुर खीरी में किसानों को कुचल देने के आरोपी के मंत्री पिता की बर्खास्तगी शामिल है। जहां कृषि कानूनों को वापस कराना किसानों के लिए जीवन मरण का संघर्ष था वहीं बिजली विधेयक को वापस कराना भी उनके लिए ऐसा ही मुद्दा है। बिजली विधेयक के कानून बनने का मतलब होगा बहुत संख्यक किसानों की पहुंच से बिजली का दूर होना जबकि बिजली न सिर्फ उनके जीवन की बेहतर गुणवत्ता के लिए जरूरी है बल्कि खेती किसानी का भी अहम साधन है। किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए एमएसपी की गारंटी एक बुनियादी शर्त है जिस पर किसान पिछले 4 साल से लगातार मांग कर रहे थे। कृषि कानूनों की वापसी आंशिक सफलता है, असल मुद्दा आज भी जस का तस है। आज के किसी संकट पैदा होने के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार रही है। यह नीतियां केवल मोदी सरकार की देन ही नहीं है बल्कि पिछली सरकारों का भी ऐसा ही हाल रहा है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद महंगाई और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए जो कदम उठाए गए थे वे किसानों के खिलाफ चले गए। समय के साथ एमएसपी में उचित बढ़ोतरी नहीं की गई जबकि खाद , कीटनाशक और डीजल के दामों में लगातार बढ़ोतरी होती चली गई। परिणाम यह है कि खेती अब अधिक है लाभकारी पेशा बन गई है। कोरोनावायरस के दौरान लाकडाउन और अर्थव्यवस्था के लगभग ठहर जाने से खेती की आय चौपट हो गई है जिससे किसानों के सामने बड़ा संकट बढ़ता जा रहा है। पूंजी पतियों को बढ़ावा देने के लिए जो नीति अपनाई गई उनके बाद ही किसानों का वर्तमान आंदोलन पैदा हुआ है। वर्तमान हालात में यही कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन केवल एक झांकी है। जिस तरह छोटे किराना कारोबारियों का हक रिलायंस ग्रुप के जिओ मार्ट जैसे शोरूम मारते जा रहे हैं उसे देखते हुए देर सवेर इस तबके का विरोध प्रदर्शन पर उतरना भी लाजमी है। कई जगह किराना व्यापारियों ने प्रदर्शन भी किए हैं। किराना व्यापारी संगठित नहीं है जबकि किसानों ने अपनी संगठन संबंधी क्षमता का प्रदर्शन कर दिया है। सच्चाई यह है कि किसान आंदोलन खत्म हो और ऐसे आंदोलन और ना हो इसके लिए आर्थिक नीतियों में बदलाव जरूरी है जो केवल पूजी पतियों के हित में न हों बल्कि मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग के हित में भी हों।

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