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खादी और खाकी दोनों ही लगातार घिरे रहे हैं विवादों में, कैसे हो सुधार

गाजियाबाद से लखीमपुर खीरी व हाथरस तक उठी खाकी पर उंगलियां, आखिर पुलिस व्यवस्था इतनी खराब और बदनाम क्यों है?

किसी भी देश की पुलिस व्यवस्था वहां के आम लोगों के लिए न्याय पाने की दिशा में पहली सीढी होती है। इसलिए जरूरी है कि हमारी पुलिस व्यवस्था दुरुस्त हो। हालत यह है कि गाजियाबाद से लेकर लखीमपुर खीरी, हाथरस, दिल्ली के दंगे, जेएनयू हिंसा, कासगंज पुलिस की कस्टडी में हुई युवक की मौत आदि कुछ ऐसे मामले हैं जिनमें खाकी का रोल विवादास्पद रहा है।
गाजियाबाद के लोनी में गोवंश कटान पर सात लोगों को मुठभेड़ में पैर में एक ही स्थान पर गोली मारने का मामला इस समय बेहद चर्चा में है। इस मामले में जहां पुलिस पर उंगलियां उठ रही है वही बीच में लोनी विधायक अपनी उपस्थिति विवादास्पद ढंग से दर्ज कराकर मामले को तूल दे रहे हैं। लखीमपुर खीरी एक ऐसा मामला है जहां खाकी और खादी दोनों का दुरुपयोग जमकर सामने आ रहा है। यही स्थिति पिछले वर्ष हाथरस में एक युवती के साथ हुई दरिंदगी के मामले में सामने आई थी। देश के अलग-अलग राज्यों में पुलिस कभी अपनी संवेदनहीनता या राजनीतिक झुकाव या भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में बनी रहती है। ज्यादातर मामलों में पुलिस समय से चार्ज शीट तक फाइल नहीं कर पाती। पिछले 20 वर्षों में पुलिस हिरासत में 1888 लोगों की मौत हुई है, पर सजा केवल 26 पुलिसकर्मियों को मिली है।
आखिर पुलिस व्यवस्था इतनी पदनाम और खराब क्यों है? हम इस व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए निर्णायक कदम आखिर कब उठाएंगे? पुलिस व्यवस्था को नजदीक से देखने वाले बताते हैं कि एक तरफ यह संसाधनों और संख्या बल की कमी से जूझ रही है तो दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों में संवेदनशीलता की भारी कमी है। यूएन रिकमेंडेशन है कि पुलिस और जनसंख्या का अनुपात 222 प्रति लाख होना चाहिए जो भारत में केवल195.39है। वर्ष 2017 में संसद में एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय मंत्री ने बताया था कि देश में पुलिस बल अपनी क्षमता से लगभग 500000 कम है। की राजधानी दिल्ली की पुलिस भी लगभग 21 फीसद कमी के साथ काम कर रही है। पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार देश में पुलिस की निर्धारित क्षमता 26.23 लाख होनी चाहिए जबकि है केवल 20.91लाख।

देश की राजधानी दिल्ली की हालत बहुत खराब है। यहां की लगभग 25 फीसद पुलिस वीआईपी सुरक्षा में लगी रहती है। राजधानी होने के कारण ज्यादातर बड़े राजनीतिक कार्यक्रम या प्रदर्शन पूरे साल होते रहते हैं जिनमें इनकी ड्यूटी लगती है। दिल्ली महिला आयोग में ज्यादातर केस पुलिस के संवेदनहीन और बुरे व्यवहार से संबंधित आते हैं। आरोप लगते हैं कि पुलिस शिकायतकर्ता को धमकाती है है या विपक्षी से पैसे ले कर मामले को दबा देती है। पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल भी सामने आता है।
हाथों को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि प्रत्येक राज्य स्तर पर एक स्टेट पुलिस बोर्ड का गठन हो जो ट्रांसफर, पोस्टिंग या प्रमोशन के मामलों को देखे। साथ ही पुलिस के खिलाफ शिकायतों के लिए राज्य और जिला स्तर पर पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी बनाई जाए। वैसे तो देश में पुलिस सुधार की कहानी कई दशक पहले शुरू हुई थी लेकिन आज भी यह निर्णायक कदम के इंतजार में है। वर्ष 1978 से 82 तक काम करने वाले नेशनल पुलिस कमीशन, वर्ष 2000 में पद्मनाभैया कमेटी और वर्ष 2002 में गठित मलिमथ कमिटी ने पुलिस सुधार के लिए सुझाव दिए थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों द्वारा पुलिस सुधार व सुझावों पर प्रगति जानने के लिए रेबोरो कपटी भी वर्ष 1998 में बनाई गई थी लेकिन इन सभी की फाइलें आज तक धूल फांक रही है। उत्तर प्रदेश में पुलिस सुधार के लिए धर्मवीर आयोग का गठन किया गया था जिस पर आज तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 22 सितंबर 2006 की आदेश के तहत 16 मई 2008 को कहा था कि विभिन्न सुझावों को लागू करवाने के लिए जस्टिस के टी एम्स की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने बीच-बीच में केंद्र और राज्यों से इस मामले में प्रगति रिपोर्ट भी मांगी। इस मामले की आखिरी सुनवाई 16 दिसंबर 2012 को हुई थी और सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों से जवाब मांगा था। गृह मंत्रालय ने एफिडेविट के जरिए अपना जवाब 26 फरवरी 2013 को जमा करवाया। यह मुद्दा कितना उपेक्षित है इसका पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
हमारे पास आधुनिक तकनीक से लैस पर्याप्त पुलिस बल हो और वह संवेदनशील हो ताकि वह राजनीतिक प्रभाव से दूर रहे। पुलिस चौकी राज्य का विषय है तो देश में पुलिस सुधार का रास्ता इतना आसान नहीं है। अधिकांश राज्य पुलिस बल का प्रयोग अपने हित में करते हैं जिस कारण पुलिस सुधार आज भी अधर में हैं। फिर भी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में केवल एक ही उम्मीद है और वह है सुप्रीम कोर्ट जो पुलिस सुधार में व्यापक बदलाव और सुधार के आदेश दे सकता है।

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