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शीर्षक – धूप मे नहीं बैठे तो झेलना पड़ सकता है मानसिक अवसाद

 

द्वारा – श्रिया त्रिसल

भारत मे पिछले कुछ वर्षो से अवसाद के ऊपर चर्चा होने लगी है. लोगो मे एक सकारात्मक दिशा मे जागरूकता बढ़ रही है. कोविड के दौरान यूनिसेफ़ की एक रिपोर्ट आयी थी जिसके अंदर बताया गया था की करीब 14 प्रतिशत भारतीय युवा जिनकी उम्र 15-24 के बीच है वो किसी तनाव या हताशा के शिकार है. अब सर्दिया आ गयी है. क्या आप जानते है की सर्दियों मे अवसाद और मानसिक तनाव के मरीजों मे वृद्धि होती है. दरअसल इसको सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर कहा जाता है. इसके कारण सिरोटोनिन रसायन का स्तर कम हो जाता है. इससे दिमाग में बदलाव होता है. सिरोटोनिन एक शक्तिशाली न्यूरो ट्रांसमीटर है जो शरीर के महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जरूरी होता है, यह मूड को नियंत्रित करने और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं के साथ नींद के पैटर्न भूख और पाचन को भी प्रभावित करता है. सर्दियों मे धूप की कमी के कारण दिमाग में सिरोटोनिन रसायन का स्तर कम हो जाता है. पहले ये परेशानी 50 वर्ष से अधिक उम्र वालों को होती थी. पर अब इसका सीधा असर बच्चों मे देखने कों रहा है. बच्चों में चिड़चिड़ापन, झगड़ा करना, रोना, बात-बात पर चिल्लाने की शिकायत बढ़ रही है. बड़ी उम्र के लोगों में उदासी और हताशा सामने आ रही है.एक मुख्य वजह खान-पान भी है. अक्सर अवसाद से पीड़ित लोग ज्यादा चीनी, सोडियम व ज्यादा कैलोरी वाला भोजन खाने लगते हैं. ऐसे में मधुमेह व हाईपरटेंशन से पीड़ित लोगों की समस्या बढ़ जाती है. ये सब सर्दियों मे ही क्यू होता है? तो इसकी बड़ी वजह धूप है. धूप की कमी से दिमाग में सिरोटोनिन रसायन का स्तर कम हो जाता है.
जिससे हार्मोन में असंतुलन पैदा होता है और शरीर में विटामिन डी की कमी आती है. इससे दिल और दिमाग पर प्रभाव पड़ता है. गर्मियों मे परेशान करने वाली धूप सर्दियों मे उतना ही फायदेमंद है. धूप भी शरीर की जरुरत है.शरीर की जैविक घड़ी (बॉडी क्लॉक) धूप कम मिलने से प्रभावित होती है और इससे व्यक्ति को डिप्रेशन महसूस होता है. इसका एक समाधान ये है की आप अपने घर, दफ़्तर पर जहां भी मौका मिले तो धूप मे जरूर बैठिये. अभी प्रदूषण भारत के कई राज्यों मे घातक स्तर पर है. उत्तर भारत मे समस्या और अधिक है. पर धूप मे बैठना भी जरुरी है. धूप मे सिर्फ तस्वीरें ही अच्छी नहीं आती बल्कि शरीर कों भी सकारात्मक ऊर्जा का एहसास होता है. आप की सोचने की क्षमता मे भी बदलाव आने लगता है. युवाओं कों संगीत सुनना अच्छा लगता है. और अवसाद बढ़ाने मे ये भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देता है.
अगर आप सैड सॉन्ग सुनते है तो मन भी उसी अनुरूप कल्पना बनता है और हैप्पी सॉन्ग मे वैसी. इसलिए अपने गाने सुनने की पसंद पर भी विचार करिये. सूर्य की रोगनाशक शक्ति के बारे में अथर्ववेद में कहा गया है कि सूर्य औषधि बनाता है तथा अपनी रश्मियों द्वारा सभी जीवों का स्वास्थ्य उत्तम रखता है.हमारे वेदों में सूर्य की पूजा को बहुत महत्व दिया गया है. प्राचीन ऋषि मुनियों ने सूर्य की शक्ति प्राप्त करके प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने का संदेश मानव जाति को दिया था. कहा जाता है कि जहां सूर्य की किरणें पहुंचती हैं, वहां रोगों के कीटाणु स्वतः मर जाते हैं और रोगों का जन्म ही नहीं हो पाता. सूर्य अपनी किरणों द्वारा अनेक प्रकार के आवश्यक तत्वों को फैलाता है. उन तत्वों के शरीर में प्रवेश करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं. पुराने समय में लोग सुबह-सुबह सूर्य नमस्कार करके विटामिन-डी ले लेते थे, लेकिन वर्तमान समय में प्रचलित भारतीय पहनावे में शरीर का अधिकांश हिस्सा ढंका रहता है, जिस वजह से शरीर को विटामिन-डी नहीं मिल पाता. सोचिये आप कितने ख़ुशनसीब है अगर बात की जाये पश्चिमी देशों की जहां बर्फबारी होती रहती है, वहां धूप तो कभी-कभी ही देखने को मिलती है, इसलिए वहां लोगों में निराशा, एकाकीपन, अरूचि तथा नकारात्मक भावना देखने को मिलती है. इसलिए ज्यादा सोचने से परहेज करिये और धूप मे समय बिताइए.

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