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सांस्कृतिक विरासत को संभालने का समय:अनिल कसाना

 

लोनी गाजियाबाद
बाल्यावस्था से ही परिवार में बच्चों को अच्छे संस्कार और मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी जानी चाहिए। उनके अनुचित व्यवहार को नजरअंदाज ना करके उन्हें समझाना चाहिए, ताकि उनकी छोटी गलतियां भविष्य में अपराध का रूप ना ले सकें। साथ ही आसपास की संदिग्ध गतिविधियों के प्रति सामाजिक जागरूकता और सजगता के द्वारा निरंतर हो रहे अपराधों को रोका जा सकता है।
वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण की चकाचौंध में युवा वर्ग हमारी पुरातन संस्कृति की महान विरासत को भूले जा रहा हैं। दूरियां इतनी बढ़ी हैं कि नैतिक मूल्यों का पतन होने लगा है, मानवता कराहने लगी है। आपसी सौहार्द, प्रेम और भाईचारे के पर्व फीके पड़ते जा रहे हैं। युवाओं की सोच दिखावे वाली बनती जा रही है। हमें याद रखना होगा कि नैतिकता, अपनत्व और देशभक्ति जैसे मूल्यों ने ही भारतीय संस्कृति को बनाए रखने में योगदान दिया है। युवा वर्ग का भारतीय संस्कृति से दूर होना देश के लिए कदापि उचित नहीं हो सकता। अत: हम हमारी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए आवश्यक कदम उठाए।

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