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उत्तर प्रदेश में बदल रहे हैं सियासत के रंग

विपक्षी दलों के सियासी गठबंधन की खबरें हर रोज बदल रही हैं रंग

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गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश में सियासत के रंग लगातार बदल रहे हैं। विपक्षी दलों के बीच संभावित गठबंधन हर रोज नई खबरों के साथ सामने आ रहे हैं। पिछले दिनों प्रियंका गांधी और जयंत चौधरी और अब मायावती की माता के निधन पर शोक संवेदना प्रकट करने पहुंची प्रियंका गांधी के बाद नए कयास लगने शुरू हो गए हैं।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने मिलकर लोकसभा चुनाव और बाद में पंचायत चुनाव लड़ा था। किसान आंदोलन के बाद मृतप्राय राष्ट्रीय लोक दल को संजीवनी मिल गई है। इसी के साथ रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी की महत्वाकांक्षा की उड़ान भरने लगी है। जो रालोद पहले उत्तर प्रदेश चुनाव में सीटों के लिए सपा की तरफ देख रहा था वह रालोद अब सीटों के लिए अपनी शर्तों पर बात कर रहा है। इसी मुद्दे पर यह चर्चा उठने लगी है कि सीटों के बंटवारे के विवाद पर सपा और रालोद के गठबंधन को ग्रहण लग सकता है। इस बात को बल पिछले दिनो लखनऊ हवाई अड्डे पर प्रियंका गांधी और जयंत चौधरी की मुलाकात और वहां से दिल्ली तक एक साथ यात्रा के बाद यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेसी और रालोद के बीच गठबंधन हो सकता है।
इसी के साथ यह चर्चा भी राजनीतिक क्षेत्रों में उठ रही है कि कांग्रेस और रालोद के अलावा इस गठबंधन में बसपा भी शामिल हो सकती है। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती ने किसी के साथ भी चुनावी गठबंधन के लिए हमला किया है। इसके बावजूद बसपा प्रमुख मायावती की माता के निधन पर शोक व्यक्त करने पहुंची प्रियंका गांधी के बाद इस बात को और बल मिल गया है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ही बुरी हालत में नहीं है बल्कि बसपा की भी इस समय काफी कमजोर की स्थिति है। यह अलग बात है कि बसपा प्रमुख मायावती से लेकर साधारण कार्यकर्ता भी यह बात मानने के लिए तैयार नहीं है कि बसपा काफी कमजोर स्थिति में है। यह बात तय है कि यदि रालोद और बसपा के साथ कांग्रेस गठबंधन करती है तो ‌ यह गठबंधन काफी मजबूत होकर उभरेगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय सपा के मुकाबले मुस्लिम वोट का झुकाव रालोद की तरफ है क्योंकि रालोद की जाट और वह मजबूत बनती है। इन दोनों मतदाता वर्ग के साथ यदि बसपा का दलित वर्ग मिल जाता है तो यह मतदाता वर्ग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ी ताकत बनकर सामने आएगा।
फिलहाल सभी राजनीतिक दल खुद को मजबूत करने और जनसंपर्क बढ़ाने में लगे हुए हैं। आने वाले 2 महीने उत्तर प्रदेश के राज्य में तेज राजनीतिक सर गर्मियों वाले होंगे और इन्हीं 2 महीनों में सत्तारूढ़ भाजपा दल के खिलाफ बनाने वाले राजनीतिक गठबंधन भी शक्ल ले लेंगे जो प्रदेश की राजनीतिक धारा को तय करने वाले साबित होंगे। यह बात यह है कि इस समय सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कोई भी राजनीतिक दल अकेले दम पर नहीं कर सकता। इसके लिए गठबंधन आवश्यक हो गए हैं जिसके बिना गैर भाजपाई दल बिखरकर रह जाएंगे।

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