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अंधविश्वास का आस्था विज्ञान पर पडा भारी..

 

मिर्जापुर।जहां आज लोग चंद्रमा व मंगल पर जाने की बात करते हैं वही आज विज्ञान पर अंधविश्वास की आस्था भारी पड रही है।
हम बात कर रहे हैं मिर्जापुर जिले के अहरौरा थाना क्षेत्र के बरही गांव स्थित बेचूबीर बाबा की।
जहां पर आज भी अंधविश्वास का आस्था विज्ञान पर भारी पड़ रहा है। यहां पर लाखों भक्त बेचूबीर के चौरी पर माथा टेकने कई राज्यों से आते हैं। बिहार. बंगाल. झारखंड. मध्य प्रदेश. व पूर्वांचल के कई जिलों से लोग आते हैं।
मान्यता है कि यहां आने से भूत प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है और निःसंतान को संतान की प्राप्ति होती है।
बताया जाता है कि यह मेला कई सौ सालों से यहां लगता चला रहा है। बेचूबीर के बारे में कहावत है कि वह शिव भक्त थे । अपने भैसों को लेकर जंगल में चराने के लिए गए थे। और जंगल में ही भगवान शिव की आराधना करने लगे। उसी बीच एक शेर ने बेचूबीर पर हमला कर दिया। तीन दिनों तक चले इस युद्ध में बेचूबीर ने अपने प्राण त्याग दिये। और उसी जगह पर उनकी समाधि बन गई। तभी से आज तक यहां तीन दिनों तक मेला लगता है।इस मेले का समापन एकादशी के भोर में बेचूबीर के पुजारी बृजभूषण यादव बगल में स्थित बरहिया नदी में स्नान करने के बाद चौरी का पूजा पाठ करते है। पूजा पाठ के दौरान एक तरह का वाद्य यंत्र मनरी बजाया जाता है उसके बाद प्रसाद के रूप में चावल का दाना अक्षत के तौर पर भक्तों को बांटा जाता है।
प्रसाद को पाने के लिए लाखों भक्त एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं और उस चावल के अक्षत को पाकर बेचूबीर का प्रसाद समझकर घर को वापस चले जाते हैं। इसी के साथ मेले का समापन होता है।
मेले में प्रशासन की तरफ से सभी इंतजाम किया जाता है वहीं सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस और पीएसी की फोर्स लगाई जाती है।
पास ही में बरहिया माता का भी चौरी है जहां पर भूत प्रेत से ग्रसित लोग आते हैं और अपनी मन्नतें मांगते हैं। मान्यता है कि बेचूबीर के मरने की खबर सुनकर उनकी पत्नी बरहिया माता ने भी अपना प्राण त्याग दिया। वहीं पर उनकी चौरी बनाई गई।जिस का आज भी पुजारी दलसिंगार द्वारा पूजा पाठ किया जाता है ।

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