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राबिया के हज के वाकिये से समझाया आला फ़क़ीर बाबा उमाकान्त जी महाराज ने रूहानी इबादत और मालिक से सच्चा इश्क़ करने की जरूरत

पूरे फ़क़ीर ही बताते हैं कि जिस्मानी इबादत से अलग रूहानी इबादत कैसे की जाए

 

 

मौजूदा वक़्त के आला फकीर, सभी जीवों को निजात पाने का तरीका बताने वाले, रूहानी इबादत का रास्ता, अनमोल दौलत- नामदान देकर इंसान को जहन्नुम और चौरासी के चक्कर से बचाने वाले, इस वक़्त के मुर्शिद-ए-कामिल उमाकान्त जी ने 4 नवम्बर 2021 को दिये व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेम पर प्रसारित खुदाई पैगाम में राबिया के हज के वाकिये से समझाया की कामिल मुर्शिद का मिलना बेहद जरूरी है। वो बताते हैं कि रूहानी इबादत कर कैसे उस सच्चे कुल मालिक को खुश किया जाए।

राबिया मशहूर साधकों में हुई, फकीर कहलाई

पहले दास प्रथा थी जिसमें बड़े अमीर लोग, नौकरों को खरीद कर पूरी जिंदगी काम कराते थे। एक अमीर ने राबिया दास को खरीद लिया। राबिया पूरे फकीर, मुर्शिद-ए-कामिल, सच्चे गुरु से जुड़ी थी, उनके पास आती-जाती थी। उन्होंने रूह को निजात दिलाने का, इस जीवात्मा को ऊपर ले जाने का इल्म, तरीका बता दिया तो वो रूहानी इबादत करती थी।

रूहानी इबादत और जिस्मानी इबादत अलग है

ये पूजा-पाठ, हवन, देवी-देवताओं की मूर्तियों पर फूल-पत्ती चढ़ाना आदि बाहरी पूजा, जिस्मानी इबादत कहलाता है। और रूहानी इबादत तो जो आपको सुरत को शब्द के साथ जोड़ने का तरीका- सुरत शब्द योग की साधना, अभ्यास बताया गया, वो है। जो नए आये हो उन्हें भी नामदान दे दिया जाएगा। तो राबिया रूहानी इबादत करती थी तो चढ़ाई होती थी। चढ़ाई किसको कहते हैं? जब साधक साधना करते है तो जीवात्मा ऊपर चली जाती है।

 

सेवक, गुलाम के लक्षण क्या होते हैं

खरीदते वक्त अमीर ने पूछा तू कहां रहेगी? क्या खाएगी? सेवा के बदले में क्या लेगी? क्या ख्वाहिश है तेरी? उसने कहा गुलाम की कोई ख्वाहिश नहीं होती। जो भी हुकुम हो उसका पालन करे वही गुलाम कहलाता है। जहां आप रखोगे, वहां रहूंगी। जो खिलाओगे, वो खाऊंगी। तो अमीर ने खरीद लिया इसको। पहले बहुत गरीबी थी। बेच देते अपने बच्चों को, इकट्ठा पैसा ले लेते। मालिक बहुत काम लेता था। लेकिन क्योंकि राबिया रूहानी थी, समझती थी किइनका कर्ज अपने ऊपर न रखें, चुका दें तो बहुत मेहनत करती। कौन सा कर्जा? उसका दिया हुआ- खाना खाती, जगह में रहती, कपड़ा पहनती थी।

रूहानी इबादत करने से राबिया का रोम-रोम प्रकाशित हो जाता था

जब राबिया रात को मालिक को सच्चे दिल से याद करती, रूहानी इबादत करती तो उसका रोम-रोम प्रकाशित हो जाता था। अमीर ने जब देखा तो समझ लिया कि ये कोई बड़ी हस्ती है, इसे रूहानी ताकत मिल गयी है। तो उससे बोला कि आप केवल इबादत करो और कोई काम नहीं करोगे। तो बोली कि बिना मेहनत का नहीं खाएंगे और निकल गई। उस समय पर कोई किसी के दरवाजे पर पहुंच जाए तो रोटी खिलाता था। वो रोटी खाते-खाते चल पड़ी। हज करने जा रही थी। थोड़े से पैसे थे, एक गधा खरीदा। गठरी लादी। पहले पानी की बहुत दिक्कत थी तो गधा मर गय। लोग बोले चलो तो बोली पैदल मैं नहीं जा सकती हूं। अब तो जब काबा हमको लेने आएगा तब हम जाएंगे। एक इब्राहिम अधम काबा जाते समय हर कदम पर नमाज अदा करता था। तो काफी समय में पहुंचा। देखा काबा तो वहां है ही नहीं। पूछा काबा कहां चले गए? बताये कि हजरत राबिया के स्वागत में चले गए, उसको लेने को गए हैं। अब आप बात समझो लो। कहते हैं अगर बड़ी हस्ती बन जाओ तो सभी छोटी हस्तियां, पवन, पानी आदि सब साथ देते हैं। हजरत राबिया ने वहीं पर हज कर लिया, उसका फल उसे वहीं पर मिल गया। इसलिए आपको भी मालिक से सच्चा प्रेम करने की जरूरत है।

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